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‘शिवाजी’ ने मां से सीखा था युद्ध कौशल, इन खूबियों से बने महान…

3 अप्रैल 1680 इतिहासकारों के अनुसार यही वह दिन है जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने संसार से विदा लिया। 

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Abha Sen

Apr 03, 2016

SHIVAJI

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जबलपुर। 3 अप्रैल 1680 इतिहासकारों के अनुसार यही वह दिन है जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने संसार से विदा लिया। छत्रपति शिवाजी, जिनका स्मरण आज भी उनकी योजनाओं, कुटनीतियों और युद्ध कौशल के लिए ही नहीं, बल्कि मानवीयता की परिपाटी पर नवीन विचारों के श्रीगणेश एवं उनके पालन के लिए भी जाना जाता है। आज हम आपको शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर उनसे जुड़ी कुछ खास बातें यहां बताने जा रहे हैं।

मां को बनाया गुरु
19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग (पुणे) में जन्मे शिवाजी का विवाह दस वर्ष की उम्र में सइबाई निम्बालकर के साथ हो गया था। पिता शाहजी भोंसले की शूरवीरता से पे्ररित शिवाजी ने मां जीजाबाई से राजनीति और युद्ध कौशल सीखा। स्वभाव से धार्मिक जीजाबाई ने हिंदू ग्रंथ रामायण व महाभारत पढ़ाकर उन्हें धार्मिक मूल्य समझाए। शिवाजी इनसे जीवनभर प्रभावित रहे और अक्सर अपना खाली समय संतों के बीच बिताते थे।

स्त्री सम्मान
उन्होंने महिलाओं को कभी बंदी नहीं बनाया। उनका आदेश था कि सेना कुछ भी ऐसा न करे जिससे महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचे। साथ ही महिलाओं से किसी भी तरह की बदसलूकी करने वाले आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा देने का प्रावधान भी रखा गया था।

shivaji

युद्धकला
छत्रपति शिवाजी को कुशल रणनीतिकार माना जाता है। युद्धकला में उन्होंने कई प्रयोग किए। छापामार युद्ध की नई शैली शिवसूत्र से कई युद्ध जीते। इसमें आक्रमण के समय दुश्मन की आगे व पीछे से ऐसी घेराबंदी की जाती थी कि वह हथियार डाल देता था। शत्रु इससे घबराते थे।

राजकाज की भाषा
उन्हें शिष्टाचार और अनुशासन से छेड़छाड़ बिल्कुल पसंद नहीं था। अपने कार्यकाल में उन्होंने हिंदू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया। साथ ही फारसी के स्थान पर मराठी व संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया।

दक्षिण में धूम
जब शिवाजी ने पुरंदर और तोरण जैसे किलों पर अधिकार जमाया, तभी उनके नाम और काम की दक्षिण में धूम मच गई। यह खबर आग की तरह आगरा और दिल्ली तक जा पहुंची। हालत यह थी कि वहां के शासक उनका नाम सुनते ही सहम जाते थे।

खास बातें
-छत्रपति शिवाजी का नाम कुलदेवी शिवायी के नाम पर रखा गया था।
-शिवाजी की सेना में ज्यादातर किसान व अप्रशिक्षित थे जिन्हें उन्होंने प्रशिक्षित किया।
-पिता के साम्राज्य से मिले 2 हजार सैनिकों की सेना को रणनीति के दम पर 10 हजार सैनिकों में तब्दील किया।
-समुद्री रास्ते से हमले रोकने के लिए इन्होंने वहां खास सेना तैनात की थी।
-शिवाजी की गुरेल्ला और छापामार युद्ध प्रणाली को बाद में भी अपनाया गया।