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जबलपुर के इस तीर्थ में चल रहा हथकरघा केंद्र, जर्मनी से आई कालीन की डिमांड

आचार्य विद्यासागर के सान्निध्य में संचालित है हथकरघा केंद्र

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Handloom center

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जबलपुर। आचार्य विद्यासागर के स्वावलम्बन के प्रकल्प हथकरघा केंद्र के उत्पादों की चमक दिनों-दिन बढ़ रही है। हस्तनिर्मित वस्त्रों की मांग देश के प्रमुख शहरों में बढऩे के साथ अब विदेशों में निर्यात का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यहां के कालीन का सैम्पल जर्मनी भेजा गया था, वहां से कालीन की मांग की गई है। जबकि, पर्यावरण और सेहत के लिहाज से उपयोगी अन्य वस्त्रों के सैम्पल भी विदेश भेजे गए हैं। दयोदय तीर्थ सहित अन्य हथकरघा केंद्रों के उत्पादों का निर्यात होने पर अपेक्षाकृत अधिक मूल्य प्राप्त होंगे और जिन्होंने इस कार्य को रोजगार का माध्यम बनाया है, उनकी आजीविका में वृद्धि होगी।

कालीन, दरी की मांग बढ़ी
कल कारखानों की बजाए चरखा और हथकरघा के माध्यम से बने वस्त्र और कालीन, दरी की मांग बढ़ रही है। दयोदय तीर्थ में प्रतिभामंडल की ब्रह्मचारिणी बहनों के सान्निध्य में उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। धागा बनाने में उपयोगी 54 अम्बर चरखा एवं 45 हथकरघा लगाए गए हैं। वाराणसी, मिर्जापुर के कारीगर छात्राओं एवं जरूरतमंदों को प्रशिक्षित कर कुशल बना रहे हैं। जबलपुर में कालीन दरी, साड़िया, दुपटे बनाए जा रहे हैं।

ऐसे बनता है कालीन-
दयोदय तीर्थ के ब्रह्मचारी सुनील भैया ने बताया, एक हथकरघा केंद्र में प्रति माह 70-80 मीटर वस्त्र बनाया जा रहा है। ताना-बाना के अनुसार जूट, ऊन और सूती धागे का मिश्रित या अलग-अलग प्रकार के कालीन बनाए जाते हैं। पतले धागे का नाटेड कारपेट महंगा और अच्छा होता है। इसमें बीकानेर की रुई एवं आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड के आयातित ऊन का प्रयोग किया जाता है।

25 प्रतिशत अधिक मिलेगा मूल्य
दयोदय तीर्थ में आचार्य विद्यासागर के दर्शन करने आए उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर निवासी ऋषभ जैन ने बताया, आचार्यश्री ने उन्हें निर्यात की जिम्मेदारी सौंपी है। चार माह बाद कालीन का जर्मनी में निर्यात शुरू होगा। देश में चार फुट चौड़े एवं छह फुट लम्बे कालीन का मूल्य तीन से 22 हजार रुपए है। निर्यात होने पर यह चार से 30 हजार तक मूल्यवान हो जाएगा।

बनारसी साड़िया भी बन रहीं
दयोदय तीर्थ में बनारसी साड़िया बनाने के तीन हथकरघा हैं। बनारस के ही कुशल कारीगर प्रशिक्षण दे रहे हैं। ये साड़िया बाजार में पसंद की जा रही हैं। प्रतिभामंडल की बहनें ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्रशिक्षण देकर ग्रामीणों को स्वावलम्बी बना रही हैं।