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दीवाली का दीया: 8 दिन की कड़ी मेहनत से बनता है मिट्टी का एक दीया, मेहनताना भी बहुत कम

दीवाली का दीया: 8 दिन की कड़ी मेहनत से बनता है मिट्टी का एक दीया, मेहनताना भी बहुत कम  

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diwali diya

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जबलपुर। दीवाली यानि रोशनी का त्यौहार, घर आंगन में काली अंधियारी रात में दमकती दीप माला की झिलमिल रोशनी जो उम्मीद के दीपों पर विश्वास की बाती के साथ जलती है। ये यकीन दिलाती है कि एक नया सबेरा खुशियों भरा होगा। कुछ ऐसी ही उम्मीदों, आशाओं के साथ जब कुम्हार साधारण सी मिट्टी को आकार देता है तो सहसा उसका मन बोल उठता है बना कर दिए मिट्टी के जरा सी आस पाली है, मेरी मेहनत खरीदो यारो, मेरे घर भी दिवाली है...। जी हां, दीवाली पर चाहे जितनी आधुनिकता का रंग लग जाए, लेकिन मिट्टी दीयों के बिना पूजन हो ही नहीं सकता है। एक दीया को बनाने में कुम्हार को 7 से 8 दिन का समय लग जाता है। इस दौरान की गई मेहनत का केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है।

महंगी होती मिट्टी, सस्ते बिकते हैं दीये
हुकुम लाल चक्रवती 76 वर्ष पिछले पांच दशकों से दीवाली पर स्वयं दीये तैयार कर शहर में बेचने आते हैं। हुकुम लाल ने बताया वे 20 साल की उम्र से दीये बनाने का काम कर रहे हैं। इस बार दो महीने पहले से 15 हजार दीये बनाने का काम शुरू कर दिया था। एक दीया तैयार होने में कड़ी मेहनत के साथ 8 दिन का समय लगता है। इस साल एक ट्रॉली पीली मिट्टी 4500 रुपए की आई। इसके बाद उसे छानना, भिगोना और चाक पर एक एक दीया बनाना। पांच दिनों तक यही क्रम चलता है। भट्टी में तपाने के लिए भूसा, कंडा, घास, लकड़ी बाजार से खरीदनी पड़ती है। दो दिनों तक पकने के बाद तीसरे दिन रंग करने पर एक दिया तैयार होता है। 1000 दीया बनाने में 500 से 550 रुपए तक लागत आती है, मेहनताना जोडकऱ ये 800 रुपए हजार तक बिकता है।

100 रुपए के लिए पूरे दिन बैठते हैं
सिविक सेंटर में मिट्टी के दीये, लक्ष्मी गणेश की दुकान लगाने वाली राखी बाई ने बताया वे पिछले तीस सालों से दीवाली पर दुकान लगाती हैं। पूरे दिन बैठने के बाद यदि एक हजार दीये बिके तो 100 रुपए मुनाफा मिलता है। इस साल थोक में 850 रुपए सैकड़ा दीया मिला है, घर से दुकान तक लाने का भाड़ा 50 रुपए लगा और हम 1 रुपए का एक दीया बेच रहे हैं। ज्यादा कीमत बोलो तो ग्राहक चला जाता है।

युवा पीढ़ी बच रही मेहनत से
कुम्हार अच्छेलाल प्रजापति शीतला माई क्षेत्र में कई पीढिय़ों से मिट्टी के दीये बनाने का काम कर रहे हैं। वे बताते हैं कई पीढिय़ों से हम ये काम कर रहे हैं। लेकिन,आने वाली पीढ़ी इस काम को करेगी ये नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि कई दिन की मेहनत के बाद मिट्टी एक सुंदर दीये का आकार लेती है। आज का युवा इतनी मेहनत नहीं करना चाहता है।

यहां बनते हैं दीये
जबलपुर में शीतला माई, कांचघर, फूटाताल, भानतलैया, सिंधी कैंप, गोकलपुर, हनुमानताल, गढ़ा पुरवा, समेत बरेला, रांझी, भेड़ाघाट में बड़ी संख्या में कुम्हारों द्वारा पीढिय़ों से मिट्टी के दीये तैयार किए जा रहे हैं।