
Mata Lakshmi welcome
जबलपुर। दीपावली का त्यौहार हो और घर आंगन में रंगोली न डले, ऐसा हो ही नहीं सकता। कोई छोटी सी रंगोली बनाता है तो कोई बड़ी आकार की रंगोली डालकर पूरे आंगन को सजा देता है। रंगोली सजने के बाद जो खुशी मिलती है वह घंटों की बारीकी से की गई मेहनत का परिणाम होती है। अकेले जबलपुर शहर की बात करें तो यहां एक दो नहीं बल्कि 700 टन से की रंगोली माता लक्ष्मी के स्वागत में सजाई जाती है। शहर में बनने वाली अच्छी किस्म की रंगोली की डिमांड आसपास के जिलों समेत अन्य प्रदेशों में भी होती है। इसे बनाने का सिलसिला एक महीने पहले से शुरू हो जाता है।
2 हजार टन के आसपास बनती है रंगोली
शहर में मौजूद खदानों से निकलने वाले सॉफ्ट मार्बल से रंगोली बनाई जाती है। रंगोली बनाने का काम न्यू भेड़ाघाट, तिलवारा क्षेत्र में कई फैक्ट्री हैं तो कुछ रंगोली उत्पादक अपने घरों व दुकानों में बनाकर लगभग 2 हजार टन थोक बिक्री करते हैं। रंगोली आर्टिस्ट एवं उत्पादक गणेश बर्मन ने बताया वे हर साल करीब 700 से 800 टन रंगोली बनाकर बेचते हैं। जिसमें करीब 300 टन अकेले जबलपुर में बिकती है, इसके अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उप्र समेत प्रदेश के कई जिलों के व्यापारी ले जाते हैं। अन्य जगहों पर बनने वाली रंगोली भी बड़ी मात्रा में बाहर भेजी जाती है।
जबलपुर में 700 टन की खपत
गणेश के अनुसार दीवाली पर घर आंगन सजाने के लिए शहर में करीब 700 टन रंगोली की खपत हो जाती है। इस साल रंगोली का फुटकर रेट 40 से 45 रुपए किलो है। इस हिसाब से करीब 3 करोड़ की रंगोली माता लक्ष्मी के स्वागत में घर आंगन को सजाने में लग जाती है। इसकी डिमांड बनी रहने की मुख्य वजह यहां पाया जाने वाला अच्छी किस्म का सॉफ्ट मार्बल है, जो अन्य कहीं नहीं पाया जाता है।
धार्मिक मान्यता से जुड़ी है रंगोली
ज्योतिषाचार्य पं. विचित्र महाराज ने बताया चौक पुराई जिसे आधुनिकता में रंगोली के नाम से जाना जाता है। रंगोली डालने की परंपरा रामायण काल से चली आ रही है। इसका उल्लेख बाल्मिकी रामायण एवं तुलसीदास जी की रामचरित मानस में मिलता है, जब श्रीराम वनवास के पश्चात अयोध्या लौटकर आते हैं। चौक या रंगोली का उद्देश्य शुभता को प्रदर्शित करने एवं उसमें बनाए जाने वाले प्रतीकों जैसे पंछी, फूल-पत्तियां, स्वास्तिक, अष्टदल कमल, श्रीयंत्र की रचना समेत अन्य रचनाएं नकारात्मक ऊर्जा से बचाती हैं। इसलिए इन्हें पूजन स्थल, घर आंगन एवं देव स्थलों पर बनाया जाता है। आटा के चौक पुराई के बिना आज भी कोई पूजन नहीं होता है। दक्षिण भारत के मंदिरों और घरों में मंगल ***** के तौर पर नित्य फूलों एवं अक्षत व द्रव्यों की रंगोली डालने की परंपरा आज भी देखी जा सकती है।
Published on:
20 Oct 2022 12:23 pm
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