
लक्ष्मी पूजन
जबलपुर। भारत भूमि विविधताओं की भूमि है। यहां पग पग पर नई परंपराएं नए विचार, रंग देखने मिलते हैं। जो किसी अन्य देशों में नहीं मिलते। इसके हृदयस्थल मध्यप्रदेश में यह आसानी से देखे जा सकते हैं। जबलपुर की बात करें तो महाकौशल का प्रमुख शहर माना जाता है। दीपावली का एक अनूठा ही रंग देखने मिलता है जो प्रदेश के अन्य जिलों में शायद ही देखने मिले। यहां दरिद्र लक्ष्मी यानी गरीबों की लक्ष्मी माता का पूजन होता है। ऐसा नहीं है की यह गरीब ही पूजा करते हैं बल्कि अमीर से अमीर भी इस लक्ष्मी की पूजा करते हैं। यह लक्ष्मी का रुप ही माना जाता है।
ज्योतिष आचार्य सत्येंद्र स्वरूप शास्त्री के अनुसार यह धरती लक्ष्मी दरअसल इस परंपरा का नाम है। क्योंकि पहले इन गरीब और अक्षम लोग माता लक्ष्मी, गणेश जी और मिट्टी के दीए खरीद नहीं पाते थे। उनका सामर्थ नहीं होता था। जिससे उन्हें परेशानी होती थी। लक्ष्मी पूजा करना भी आवश्यक होता था। जिसके फलस्वरुप लक्ष्मी का एक ऐसा स्वरूप सामने आया जो ग्वालन कहलाया। ग्वाल बालों की यह प्रमुख देवी वाली है। जिसमे लक्ष्मी जी के साथ दिए भी लगे हुए साथ में आते हैं। इन दीपों की संख्या ७,5 भी हो सकती है। यह लक्ष्मी बुंदेलखंड महाकौशल छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र सहित अन्य हिंदी भाषी राज्यों में पूजी जाती है।
शांति दिलाती हैं ग्वालन
ज्योतिषाचार्य डॉ. सत्येन्द्र स्वरूप शास्त्री ने बताया के अनुसार लक्ष्मी के वैसे तो हजारों रूप हैं, लेकिन मूल अठारह रूपों में इनकी पूजा होती है। महालक्ष्मी इनकी प्रधान देवी कही गई हैं। इन रूपों में एक दरिद्र लक्ष्मी भी हैं, जो कि समूचे बुंदेलखंड, महाकोशल, छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र सहित हिन्दी भाषी राज्यों में पूजी जाती हैं। इनके बिना समूचे बुंदेलखंड व महाकोशल क्षेत्र में लक्ष्मी पूजन नहीं किया जाता। नौ दीपों को धारण करने वाली ग्वालन धन-धान्य व समृद्धि की प्रतीक मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि ये घरों से कलह, दोष आदि को दूर करती हैं।
इनका पूजन लक्ष्मी-गणेश जी के साथ बराबर से किया जाता है। दरिद्र लक्ष्मी को ग्वालन भी कहा जाता है। ये नौ दीपों के साथ आती हैं, जिनका अर्थ व्यक्ति को नौ ग्रहों से शांति दिलाना होता है। प्रत्येक दीप एक ग्रह का ***** होता है। इन सभी दीपों में लाई, बताशा, सिंघाड़ा आदि रखकर इनका पूजन किया जाता है। पूजन अर्चन करने वालों के घर-परिवारों में दरिद्रता नहीं आती। साफ-सफाई देखकर ये प्रसन्न होती हैं।
कल्चुरी काल से भी पुरानी परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार ग्वालन पूजन की परंपरा कल्चुरी काल से भी पुरानी है। मूल रूप से यह परंपरा बुंदेलखंड की है, जो अन्य क्षेत्रों व प्रदेशों तक फैल गई। पहले सम्पन्न लोग लक्ष्मी-गणेश का पूजन करते थे, लेकिन गरीब व निचला तबका इस पूजन के योग्य नहीं माना जाता था, जिसके बाद दरिद्र लक्ष्मी या ग्वालन के पूजन का प्रचलन प्रकाश में आया। दरिद्र लक्ष्मी गरीबों व निचले तबकों को सुख समृद्धि प्रदान करने वाली मानी गई। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
केवल मिट्टी की ही मान्य
एक ओर जहां लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं पीओपी व धातुओं की पूजी जाती हैं, वहीं कच्ची मिट्टी व प्राकृतिक रंगों से बनी ग्वालन आज भी पूजी जाती है। इसके अलावा किसी भी वस्तु से बनी ग्वालन पूजन में मान्य नहीं है। जिसे बाद में पूजन घर में रख लिया जाता है और अगले साल की दीवाली पर उसे पेड़ों या गमलों में रखकर विसर्जित कर दिया जाता है। ऐसा करने से घर की ग्वालन हमेशा के लिए घर पर ही रह जाती है।
हर अंचल में जाती हैं मूर्तियां
परम्पराओं की एक और कड़ी जुड़ती है दिवाली पूजन के दिन। जहां शहर में कई परिवार सोने-चांदी और मिट्टी की लक्ष्मी गणेश मूर्तियों का पूजन करते हैं, तो वहीं कुछ परिवारों में सिर पर आठ या दस दीयों को रखे हुई ग्वालन की मूर्ति की पूजा होती है। दरअसल प्राचीन परम्पराओं के चलते बुंदेलखंड अंचल में दिवाली पर ग्वालन पूजन होता रहा है। शहर में आज भी कई मूर्तिकार ग्वालन की मूर्तियां बनाते हैं।
आती और जाती हैं मूर्तियां
लक्ष्मी गणेश की मूर्तियों का व्यापार विशेष रूप से शहर और आस-पास के क्षेत्रों में होता है। शहर में दिल्ली, बुरहानपुर, नागपुर से लक्ष्मी गणेश की तैयार मूर्तियां शहर में बिक्री के लिए आती हैं। वहीं छिंदवाड़ा, नागपुर, मंडला, कटनी आदि जिलों में ग्वालन की मूर्तियां सप्लाय की जाती हैं।
Published on:
10 Oct 2017 03:03 pm
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