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जबलपुर. नर्मदा की सहायक नदी गौर, हिरन और परियट गोबार, गाद से पट गईं हैं। हिरन नदी में रेत नहीं बची है। नदियों की धार जगह-जगह टूट रही है। ये नदियां जीवन बचाने के लिए शोध मांग रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है की सहायक नदियों का उद्धार होने पर ही जीवनदायिनी नर्मदा की धार बढ़ेगी। इंदौर ने कान्ह और सरस्वती नदी को पुनर्जीवित कर उदाहरण प्रस्तुत किया है। यहां भी नदियों को नया जीवन दिया जा सकता है।
शहर में हर हाल में रिवर रिसर्च सेंटर की दरकार
बेकद्री से मिट गईं
विशेषज्ञों का मानना है कि शहर में हर हाल में रिवर रिसर्च सेंटर स्थापित होना चाहिए, जो नदियों पर लगातार रिसर्च करे। इससे नदियों का जीवन बचाने के साथ उनके ईको सिस्टम और पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार पिछले सौ साल में शहर में जलस्रोतों की लगातार बेकद्री हुई। इसी का परिणाम है कि शहर के बीचोंबीच से होकर प्रवाहित होने वाली ओमती व मोती नदी गंदे नालों में तब्दील हो गईं। ब्रिटिश कॉल के गजेटियर में दर्ज ओमती-मोती नदी को नगर की विकास योजनाओं में नालों का नाम दे दिया गया।
ओमती-मोती नदी की समूचे सिस्टम ने मिलकर हत्या कर दी। ऐसा ही गौर, परियट, हिरन नदी के साथ हो रहा है। ये गंभीर मामला है। अगर ये सहायक नदी नहीं होंगी तो नर्मदा की धार भी दिनोंदिन पतली होती जाएगी। इसके लिए आवश्यक है नदियों पर शोध हो और उनके उद्धार के लिए समूचा सरकारी तंत्र वृहद स्तर पर काम करे।
प्रो. एचबी पालन, पर्यावरणविद्
नदियों का अपना पूरा ईको सिस्टम है। पर्यावरण को सुरक्षित करने के लिए नदियों में पर्याप्त जल होने के साथ ही उनका स्वस्थ होना भी आवश्यक है। ऐसे में नदियों पर रिसर्च के लिए रिवर रिसर्च सेंटर स्थापित किया जाना चाहिए। जिसमें विशेषज्ञों का नियमित स्टाफ हो जो लगातार शोध करे और नदियों को पुनर्जीवित कर उनके तटों को हरियाली से आच्छादित करने के लिए मार्गदर्शन कर सके।
डॉ. पीआर देव, वैज्ञानिक
Published on:
24 May 2023 02:46 pm
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