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 पांच पतियों के बाद भी था कौमार्य का वरदान, जानिए द्रोपदी से जुड़े अद्भुत रहस्य

5 बार की तपस्या से प्रसंन्न भगवान शिव दिया था वरदान, कुंती के वचन पर बनीं पांचाली

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neeraj mishra

Aug 31, 2016

Fire pit, birth, Draupadi

Fire pit, birth, Draupadi


जबलपुर। महाभारत युद्ध द्रोपदी के एक वाक्य के चलते हुआ था। वह था अंधे के पुत्र अंधे ही होते हैं। हम आपको उसी द्रोपदी के जन्म की कहानी बताने जा रहे हैं कि कैसे उनका जन्म हुआ था। महाभारत ग्रंथ के अनुसार एक बार राजा दु्रपद ने कौरवो और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का अपमान कर दिया था। गुरु द्रोणाचार्य इस अपमान को भूल नहीं पाए।

इसलिए जब पाण्डवों से शिक्षा समाप्ति के पश्चात गुरु द्रोणाचार्य से गुरु दक्षिणा मांगने को कहा तो उन्होंने उनसे गुरु दक्षिणा में राजा दु्रपद को बंदी बनाकर अपने समक्ष प्रस्तुत करने को कहा। पांडव गए और उन्होंने द्रुपद को बंदी बनाकर द्रोणाचार्य के समक्ष प्रस्तुत किया। द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लेते हुए द्रुपद का आधा राज्य स्वयं के पास रख लिया और शेष राज्य द्रुपद को देकर उसे रिहा कर दिया। महर्षि दुर्वासा ने नदी में स्नान के दौरान और भोलेनाथ ने तपस्या के दौरान द्रोपदी को चिर कौमार्य का भी वरदान दिया था। वरदान से घबराई द्रोपदी को ऋषि और भोलेनाथ ने आशीर्वाद दिया था। पर उन्हें ये वरदान था कि जब तक वे पांच में से किसी भी एक के पास रहेंगी तो दूसरा उन्हें पत्नी भाव से नहीं देखेगा। जब वे एक पति के साथ धर्म का निर्वाह करके दूसरे के पास जाएंगी तो उनका कौमार्य लौट आएगा।




द्रुपद ने किया था यज्ञ

गुरु द्रोण से पराजित होने के उपरान्त महाराज द्रुपद अत्यन्त लज्जित हुए और उन्हें किसी प्रकार से नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे। इसी चिन्ता में एक बार वे घूमते हुए कल्याणी नगरी के ब्राह्मणों की बस्ती में जा पहुंचे। वहां उनकी भेंट याज तथा उपयाज नामक महान कर्मकाण्डी ब्राह्मण भाइयों से हुई। राजा द्रुपद ने उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया एवं उनसे द्रोणाचार्य के मारने का उपाय पूछा। उनके पूछने पर बड़े भाई याज ने कहा, इसके लिये आप एक विशाल यज्ञ का आयोजन करके अग्निदेव को प्रसन्न कीजिए जिससे कि वे आपको वे महान बलशाली पुत्र का वरदान दे देंगे। यज्ञ से प्रसन्न हो कर अग्निदेव ने उन्हें एक ऐसा पुत्र दिया जो सम्पूर्ण आयुध एवं कवच कुण्डल से युक्त था। उसके पश्चात् उस यज्ञ कुण्ड से एक कन्या उत्पन्न हुई। उसके उत्पन्न होते ही एक आकाशवाणी हुई कि इस बालिका का जन्म क्षत्रियों के संहार और कौरवों के विनाश के के लिए हुआ है। बालक का नाम धृष्टद्युम्न एवं बालिका का नाम कृष्णा रखा गया जो की राजा द्रुपद की बेटी होने के कारण द्रौपदी कहलाई।


शिवजी के वरदान के कारण मिले पांच पति

द्रौपदी पूर्व जन्म में एक बड़े ऋषि की गुणवान कन्या थीं। वह रूपवती, गुणवती और सदाचारिणी थी, लेकिन पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण किसी ने उसे पत्नी रूप में स्वीकार नहीं किया। इससे दुखी होकर वह तपस्या करने लगी। उसकी उग्र तपस्या के कारण भगवान शिव प्रसन्न हए और उन्होंने द्रौपदी से कहा तू मनचाहा वरदान मांग ले। इस पर द्रौपदी इतनी प्रसन्न हो गई कि उसने बार-बार कहा मैं सर्वगुणयुक्त पति चाहती हूं। भगवान शंकर ने कहा तूने मनचाहा पति पाने के लिए मुझसे पांच बार प्रार्थना की है। इसलिए तुझे दुसरे जन्म में एक नहीं पांच पति मिलेंगे।


यह है पांचाली बनने की कहानी

कुंती तथा पांडवों ने द्रौपदी के स्वयंवर के विषय में सुना तो वे लोग भी सम्मिलित होने के लिए धौम्य को अपना पुरोहित बनाकर पांचाल देश पहुंचे। कौरवों से छुपने के लिए उन्होंने ब्राह्मण वेश धारण कर रखा था तथा एक कुम्हार की कुटिया में रहने लगे। राजा द्रुपद द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ करना चाहते थे। लाक्षागृह की घटना सुनने के बाद भी उन्हें यह विश्वास नहीं होता था कि पांडवों का निधन हो गया है, अत: द्रौपदी के स्वयंवर के लिए उन्होंने यह शर्त रखी कि निरंतर घूमते हुए यंत्र के छिद्र में से जो भी वीर निश्चित धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर दिए गए पांच बाणों से, छिद्र के ऊपर लगे, लक्ष्य को भेद देगा, उसी के साथ द्रौपदी का विवाह कर दिया जाएगा। ब्राह्मणवेश में पांडव भी स्वयंवर-स्थल पर पहुंचे। अर्जन ने छद्मवेश में पहुंचकर लक्ष्य भेद दिया तथा द्रौपदी को प्राप्त कर लिया।

Fire pit

मां की आज्ञा पर बनीं पांचाली

कृष्ण उसे देखते ही पहचान गए। अर्जुन तथा भीम के रण-कौशल तथा कृष्ण की नीति से शांति स्थापित हुई तथा अर्जुन और भीम द्रौपदी को लेकर डेरे पर पहुंचे। उनके यह कहने पर कि वे लोग भिक्षा लाएं हैं, उन्हें बिना देखे ही कुंती ने कुटिया के अंदर से कहा कि सभी मिलकर उसे ग्रहण करो। पुत्रवधू को देखकर अपने वचनों को सत्य रखने के लिए कुंती ने पांचों पांडवों को द्रौपदी से विवाह करने के लिए कहा। व्यास मुनि के व्यवस्था देने पर द्रौपदी का विवाह क्रमश: पांचों पांडवों से कर दिया गया। इस तरह से पांचो पांडवो से विवाह करके द्रौपदी पांचाली कहलाई।

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