लाली कोष्टा @ जबलपुर। जब से सृष्टि बनी है, तभी से मनुष्य चांद सूरज को छूने की लालसा रखता है। चांद को छूने में उसने सफलता भी पा ली है, लेकिन सूरज को छूना तो दूर, उसके करीब तक पहुंचना भी मनुष्य के बस की बात नहीं लगती है। क्योंकि सूरज का तापमान सहन करने की क्षमता किसी में नहीं है। वहीं श्रीराम भक्त हनुमान जी ने यह कारनामा करीब डेढ़ करोड़ साल पहले ही कर दिखाया था। यही नहीं उन्होंने सूरज को फल समझ कर खा भी लिया था।
अमरिका, रूस, चीन, जापान की अंतरिक्ष एजेंसियों सहित कई विकसित देश सूरज तक अपनी पहुंच बनाने में जुटे हैं, लेकिन किसी को सफलता आज तक नहीं मिली है। वहीं हनुमान जी ने अपनी बाल्यावस्था में लाखों मील दूर सूरज पर कदम रखा, बल्कि फल जानकर उसे खा भी लिया था।
तुलसी दास ने बताई दूरी, नासा ने की प्रमाणित
आज से हजारों साल पहले हनुमान ने पृथ्वी से सूर्य तक की दूरी तय कर ली थी, जिसे तुलसी दास जी ने हनुमानचालीसा में वर्णित भी किया है। यहीं नहीं इस दूरी को नासा जैसी विश्वस्तरीय अंतरिक्ष एजेंसी भी प्रमाणित कर चुकी है।
ऐसें समझें दूरी का गणित
दोहा - जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लिल्यो ताहि मधुर फल जानू ।
एक युग 12000 साल
सहस्त्र 1000
1 योजन 08 मील (1 मील= 1.6 किमी)
युग x सहस्त्र x योजन = 12000 x 1000 x 8 मील = 96000000 मील
96000000 x 1.6 किलो मीटर =1536000000 किमी
( नासा द्वारा बताई गई दूरी भी यही है।)
इच्छा हुई और चल पड़े
ज्योतिषाचार्य डॉ. सत्येन्द्र स्वरूप शास्त्री के अनुसार रामायण व अन्य शास्त्रों में वर्णित कथाओं के लिए बाल हनुमान को सूरज में फल नजर आया। इससे उन्हें खाने की इच्छा हुई। इसके बाद पवनपुत्र बाल हनुमान सूरज को खाने 1536000000 किमी के सफर पर निकल पड़े। सूरज तक पहुंचता देख राहू ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन वो असफल रहा।
इंद्र ने वज्र मार सूरज को मुक्त कराया
हनुमान से पराजय के बाद राहू इन्द्र देव के पास पहुंचे और उन्हें पूरी घटना बताई। इन्द्र ने बाल हनुमान को रोकने का प्रयास किया, किंतु तब तक हनुमान जी सूरज को निगल चुके थे। जिससे समूची सृष्टि पर अंधियारा छा गया। इस पर सूरज को हनुमान जी के मुंह से निकालने के लिए इन्द्र ने अपने वज्र से प्रहार किया। बालक हनुमान वज्र का प्रहार सहन नहीं कर पाया और नीचे जा गिरा और सूरज को मुंह से बाहर कर दिया। इस प्रहार से हनुमान जी की बाई ठोड़ी टूट गई।
पिता से नहीं देखी गई पुत्र की पीड़ा
इंद्र द्वारा हनुमान पर वज्र से प्रहार देखकर पिता पवनदेव को क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी वायु गति रोक दी। जिससे सृष्टि के समस्त जीव छटपटाते हुए मूर्छित व मृत्यु के करीब पहुंचने लगे। ऐसे समय ब्रह्मा जी अन्य देवताओं के साथ पवनदेव के पास पहुंचे। उन्होंने तत्काल हनुमान की मूर्छा दूर की और वरदान दिया कि हनुमान की मर्जी के बना उन पर कोई भी अस्त्र-शस्त्र असर नहीं कर सकेगा। इसके अलावा अन्य देवताओं ने भी हनुमान को दुर्लभ शक्तियों से भर दिया। जिससे वे संकटमोचन बन गए।