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भा रही सामूहिक तीर्थयात्रा , बढ़ा रुझान

शहर के धर्मपरायण श्रद्धालुओं को आजकल सामूहिक तीर्थयात्रा खूब भा रही हैं। लोग समूह बनाकर देश के सुदूर अंचलों में स्थित तीर्थो के दर्शन करने के लिए जा रहे हैं। साल भर में शहर से बड़ी संख्या में ऐसे जत्थे सामूहिक तीर्थयात्रा करने के लिए जा रहे हैं। सरकारी तीर्थयात्रा ट्रेनों ने भी इस ओर लोगों का रुझान बढ़ाया है।सामूहिक तीर्थयात्रा के में सुरक्षा, सहयोग और कम खर्च लोगों को इसकी ओर आकर्षित कर रही है।

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साल में जा रहे कई जत्थे, स्पेशल वाहन कर रहे
जबलपुर।
शहर के धर्मपरायण श्रद्धालुओं को आजकल सामूहिक तीर्थयात्रा खूब भा रही हैं। लोग समूह बनाकर देश के सुदूर अंचलों में स्थित तीर्थो के दर्शन करने के लिए जा रहे हैं। साल भर में शहर से बड़ी संख्या में ऐसे जत्थे सामूहिक तीर्थयात्रा करने के लिए जा रहे हैं। सरकारी तीर्थयात्रा ट्रेनों ने भी इस ओर लोगों का रुझान बढ़ाया है।सामूहिक तीर्थयात्रा के में सुरक्षा, सहयोग और कम खर्च लोगों को इसकी ओर आकर्षित कर रही है। बुजुर्गों का मानना है कि समूह में तीर्थयात्रा आसान और निर्बाध हो जाती है।

होती है बसों की बुकिंग -
सामूहिक तीर्थयात्राओं के संयोजक यात्रियों की पर्याप्त संख्या होने पर इसके लिए बसों की बुकिंग करते हैं। अलग अलग रूट और व्यवस्थाओं के लिए अलग अलग रेट लिए जाते हैं। रूट की लंबाई व यात्रा में लगने वाले दिनों के हिसाब से हर तीर्थयात्री के लिए एक निश्चित रकम निर्धारित की जाती है।ये यात्रा के साथ यात्रियों के विभिन्न स्थानों पर ठहरने की व्यवस्था भी करते हैं।

खर्च में बचत-
सामूहिक तीर्थयात्राएं आर्थिक रूप से लोगों को खासी पसन्द आ रही हैं। इनमे व्यक्तिगत तीर्थयात्रा की तुलना में काफी कम खर्च आता है। गुलौआ चौक निवासी बुजुर्ग शिव कुमार चौरसिया कहते हैं कि सामूहिक तीर्थ यात्रा उनके बजट में है। वे कुछ वर्षों पूर्व द्वारकाधीश के दर्शन करने गए थे। तब किराए व ठहरने की व्यवस्था में उनका करीब 15 हजार रु खर्च हुआ था। जबकि इस वर्ष वे सामूहिक तीर्थयात्रा में गए तो उन्हें महज 7 हजार रु ही खर्च आया। इसी तरह गढ़ा के श्यामलाल अग्निहोत्री का कहना है सामूहिक तीर्थयात्रा के लिये उन्हें अब पैसे जोड़ने की जरूरत नहीं है ।
एक रूट के सभी तीर्थस्थलों के दर्शन-
सामूहिक तीर्थयात्रा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि तीर्थयात्री एक ही रूट में पड़ने वाले सभी तीर्थस्थलों के दर्शन कर सकते हैं। इसके लिए वे तीर्थयात्रा संयोजकों को इच्छा प्रकट कर मनपसंद रूट के लिए तीर्थयात्रा के जत्थे में शामिल हो जाते हैं। तीर्थयात्रा की बसें समय के हिसाब से रूट के हर तीर्थस्थल पर निर्धारित समय तक ठहरती हैं। इस बीच यात्रियों को तीर्थस्थल तक पहुंचाने और वापस बस तक लाने की व्यवस्था भी तीर्थयात्रा के खर्च में शामिल होती है।
कम समय में यात्रा-
रास्ते के हर तीर्थस्थल पर एक निश्चित समय लगता है। इसलिए सामूहिक तीर्थयात्राएं कम समय मे पूरी हो जाती हैं। स्नेहनगर के किशोर गुप्ता कहते हैं कि व्यक्तिगत रूप से तीर्थयात्रा में टिकिट, रिजर्वेशन, ट्रेनों की लेटलतीफी आदि दिक्कतों का चलते काफी वक्त बर्बाद होता है। सामूहिक तीर्थयात्रा में इसलिए समय कम लगता है।
परेशानी नहीं होती-
सामूहिक तीर्थयात्राओं के प्रति बढ़ते रुझान की एक बड़ी वजह इसमें परेशानियों का न होना है। ट्रेन या बस पकड़ने के लिए इंतजार, लगेज ढोना, यात्रा के दौरान ठहरने, विश्राम, भोजन की दिक्कत जैसी कई परेशानियों से सामूहिक तीर्थयात्रा में निजात मिल जाती है। बलदेवबाग के नीरज वैष्णव कहते हैं कि पहले वे तीर्थयात्रा के लिए जल्दी तैयार नही होते थे। लेकिन अब जब भी मन करता है, वे सामूहिक तीर्थयात्रा के जत्थे के साथ निकल जाते हैं।
अकेलेपन से दूर-
सामूहिक तीर्थयात्रा उन लोगों को अधिक भा रही है, जो अकेले तीर्थ दर्शन करना चाहते हैं। सामूहिक तीर्थ यात्रा में यात्री भजन, कीर्तन व प्रभु स्मरण करते हुए जाते हैं। सहयात्रियों से संवाद और यात्रा में सहयोग भी मिलता है। इस वजह से उन्हें एकाकीपन का अनुभव नहीं होता। घमापुर के विशाल जायसवाल का कहना है कि उनके पिता जी कई वर्षों से तीर्थयात्रा के लिए उत्सुक थे। लेकिन अकेले जाने में उन्हें हिचक होती थी। बीते दो वर्षों में वे सामूहिक तीर्थयात्राओं के जरिए कई तीर्थो का भ्रमण कर चुके हैं।
इन स्थानों पर अधिक जाते हैं-
मथुरा, वृंदावन, अयोध्या, काशी,ऋषिकेश, हरिद्वार, बद्रीनाथ, वैष्णोदेवी, सोमनाथ, द्वारकाधीश,तिरुपति, रामेश्वरम, त्रिवेंद्रम, जगन्नाथपुरी, शिरडी, नासिक, गंगासागर, सम्मेद शिखर, अमृतसर