
Parad Shivalinga Gitadham Jabalpur
स्वयंप्रतिष्ठित माना जाता है स्फटिक शिवलिंग, पारदेश्वर महादेव के प्रति भी अगाध श्रद्धा
जबलपुर।
संत,विद्वानों के अनुसार शिवलिंग के अनेक प्रकार बताए गए हैं, जो सृष्टि में व्याप्त अलग-अलग ब्रम्हांडों के प्रतीक माने जाते हैं। इनमें पारद शिवलिंग व स्फटिक के शिवलिंग की महिमा अलग है। मान्यता है कि वैदिक रीति से स्थापित पारद शिवलिंग चमत्कारी होता है। इसके दर्शन मात्र से बाधा दूर हो जाती है। वहीं स्फटिक निर्मित शिवलिंग को स्वयंप्रतिष्ठित और मनोकामना पूर्ण करने वाला माना जाता है। संस्कारधानी में इन दिनों पारद व स्फटिक शिवलिंग विराजित करने के प्रति आस्था बढ़ी है। मन्दिरों के साथ ही लोग बड़ी संख्या में घरों में भी पारद व स्फटिक शिवलिंग विराजित कर रहे हैं।
कटंगी में विश्व के सबसे बड़े पारदेश्वर महादेव-
संस्कारधानी के ग्वारीघाट स्थित गीता धाम परिसर में विशाल पारद शिवलिंग विराजमान है। यहां विराजित शिवलिंग का नित्य पूजन किया जा रहा है। गीताधाम के संत डॉ. स्वामी नरसिंहदास के अनुसार महाशिवरात्रि पर यहां रुद्राभिषेक व विशेष वैदिक अनुष्ठान होगा। जबलपुर के समीप कटंगी स्थित प्रज्ञाधाम में विश्व के सर्वाधिक विशाल 1111 किलो के पारदेश्वर महादेव विराजित हैं। प्रज्ञाधाम के संस्थापक डॉ. स्वामी प्रज्ञानंद ने इसकी प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। महाशिवरात्रि पर पारदेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक होता है, जिसमें श्रद्धालु उमड़ते हैं।
छोटे पारद व स्फटिक शिवलिंग अधिक-
शहर मे बड़ी संख्या में लोगों ने अपने घरों के मन्दिर में पारद व स्फटिक शिवलिंग स्थापित किये हैं। विजयनगर निवासी शैलेंद्र तिवारी बताते हैं कि उन्हें पारद शिवलिंग के पूजन से चमत्कारिक लाभ मिला।वहीं गंगानगर निवासी चैतन्य सोनी कहते हैं कि उनके घर मे पारद व स्फटिक के शिवलिंग हैं। इनकी पूजा से बाधाएं दूर होती हैं।
लगता है दो माह तक समय-
पारद का शोधन बहुत कठिन माना जाता है। इसे ठोस बनाने के लिए वैदिक क्रियाओं सहित 64 दिव्य औषधियों के मिश्रण उपरांत शोधन कर जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है तब जाकर पारा ठोस आकार ले पाता है। पुरोहित जनार्दन शुक्ला ने बताया कि पारद शिवलिंग बनाने में एक से दो माह तक का समय लग जाता है। निर्माण के बाद मांत्रिक क्रियाओं के द्वारा रससिद्धि एवं चैतन्य किया जाता है,तब जाकर शिवलिंग पूर्ण सक्षम एवं प्रभावयुक्त बनता है।पारद को भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। ताम्र को माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है। इन दोनों के समन्वय से शिव और शक्ति का सशक्त रूप उभर कर सामने आ जाता है। ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमयी हो जाता है। इसीलिए ऐसे शिवलिंग को "सुवर्ण रसलिंग" भी कहते हैं। पारद शिवलिंग की महिमा का वर्णन रूद्र संहिता, पारद संहिता, रसमार्तंड ग्रन्थ, ब्रह्म पुराण, शिव पुराण , योग शिखोपनिषद आदि ग्रन्थों में मिलता है। रायसेन के मंगरोल में 5 हजार से लेकर लाखों रुपए तक के पारद शिवलिंग सोना-चांदी सहित 64 औषधियों की मात्रा के अनुसार तैयार होते हैं।
बेल्जियम के स्फटिक का शिवलिंग-
अधिवक्ता नरेन्द्र निखारे ने अपने आंगन में मंदिर बनाकर स्फटिक शिवलिंग स्थापित किया है। इसकी ऊंचाई 30 इंच और वजन 55 किलोग्राम है। अधिवक्ता निखारे ने बताया कि चारों धाम की यात्रा के दौरान ऋषिकेश में स्फटिक के छोटे से शिवलिंग नजर आए। बताया गया कि स्फटिक शिवलिंग साक्षात शिव व स्वयं प्राण-प्रतिष्ठित होते हैं। उन्होंने इसके लिए बुकिंग कर दी। लंबे इंतजार के बाद बेल्जियम से 2013 में अनगढ़ स्फटिक शिला आई, जिसे जयपुर भेजा गया। उसे तराश कर सम्मोहक पारदर्शी शिवलिंग बनाया गया। बेल्जियम सहित अन्य मुख्य बाजारों में स्फटिक का मूल्य 40 हजार रुपए प्रति किलो है। इस हिसाब से शिवलिंग का मूल्य 22 लाख रुपये है। निखारे ने बताया कि जो हिमखंड हजारों वर्ष नीचे दबे रहकर पिघलते नहीं हैं, वे कालांतर में स्फटिक का रूप ले लेते हैं। स्विट्जरलैंड व बेल्जियम में ये बहुतायत में पाए जाते हैं।
शत अश्वमेघ यज्ञ का फल-
गीताधाम के डॉ. स्वामी नरसिंह दास के अनुसार पौराणिक ग्रंथ "रस रत्न समुच्चय" माना गया है कि 100 अश्वमेध यज्ञ, चारों धामों में स्नान, कई किलो स्वर्ण दान और एक लाख गौ दान से जो पुण्य मिलता है, वह पुण्य पारे से निर्मित शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही उपासक को मिल जाता है। पारद एक ऐसा शुद्ध पदार्थ माना गया है जो भगवान भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है। इसकी महिमा केवल शिवलिंग से ही नहीं बल्कि पारद के कई और अचूक प्रयोगों के द्वारा भी मानी गयी है। स्वामी नरसिंह दास का मानना है कि पारद शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दोषों से मुक्ति मिल जाती है। शास्त्रों में यहां तक लिखा है कि इसके दर्शन मात्र से समस्त परेशानियों का अंत हो जाता है।
Published on:
02 Feb 2023 12:23 pm
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