
fire in residential area jabalpur
जबलपुर। घनी बस्ती में कतार से लगे टालों में भड़की आग से जब बस्ती जलेगी क्या तभी सरकार जागेगी? यह सवाल आम लोगों के साथ उन टिम्बर व्यापारियों के भी हैं, जो यह चाहते हैं कि शहर में एक टिम्बर हब बने। टिम्बर हब बनाने के लिए करीब एक दशक से सिर्फ कोशिशें ही की जा रही है,लेकिन नतीजा कुछ न निकला। बैठकों के दौर चले। प्रस्ताव बनाकर मंत्रालय भेजे गए, लेकिन सारे प्रस्ताव मंत्रालय से बाहर नहीं निकल सके। गौरतलब है शहर में दो भयावह अग्निकांड हो चुके हैं, जिसमें बस्तियां खाली कराई गई थीं।
शहर के छोटी लाइन फाटक से लेकर मदनमहल और गढ़ा तक करीब तीन सैकड़ा से अधिक लकड़ी के टाल हैं। इन टालों में आरा मशीनें लगी हुई हैं। यहां पर लकड़ी का ढेरों स्टॉक रहता है। स्टॉक इतना अधिक रहता है कि कई टालों में लकड़ी के बड़े-बड़े पट्टे सड़क पर पड़े रहते हैं।
fact- घनी बस्ती में लकड़ी के टाल, पर्यावरण-आवास मंत्रालय में फंसा मामला, 10 वर्ष में नहीं बन सका टिम्बर हब!
सरकारी कवायद
टिंबर हब बनाने के लिए सरकार ने दो-तीन बार बैठकें की। इन बैठकों में कमिश्नर, कलेक्टर सहित सभी विभागों के प्रमुख मौजूद थे। बैठक में यह मसौदा तैयार किया था कि टिंबर पार्क या हब के लिए शहर में एक व्यवस्थित जगह दी जाएगी। इस मामले में प्रस्ताव बनाकर पर्यावरण आवास मंत्रालय भेजा गया है लेकिन करीब एक वर्ष से इस पर कोई सुनवाई नहीं हो सकी।
मानेगांव: व्यापारियों से चर्चा करने के बाद मानेगांव (तिलवारा) के समीप जगह चिन्हित की गई लेकिन सरकारी नियमों में मानेगांव का प्रोजेक्ट फेल हो गया।
तेवर: व्यवस्थित हब के लिए तेवर में वॉटर पार्क के समीप भी जमीन तलाशी गई लेकिन वन विभाग के नियमानुसार यह जगह भी फाइनल नहीं हो सकी।
बहदन गांव: शहर के मास्टर प्लान के मुताबिक उद्योग के आरक्षित जगह बहदन गांव में टिंबर पार्क बनाना तय किया गया लेकिन वहां भी जबलपुर विकास प्राधिकरण की स्कीम नंबर ६४ आड़े आ गई है।
लौटा दी गई राशि
टिंबर पार्क का फाइनल होने पर टिंबर व्यापारियों ने जगह के लिए दस-दस हजार रुपए एकत्र किए थे ताकि हब बनने पर उन्हें जमीन आवंटित हो सके और वे एकजुट होकर जमीन की अग्रिम रकम दे सके। टिंबर पार्क का फाइनल नहीं होने से एसोसिएशन ने करीब एक वर्ष बाद व्यापारियों की राशि लौटा दी। व्यापारियों ने करीब १५ लाख रुपए की राशि एकत्र की थी।
नियम में फंसा मामला
टिम्बर लायसेंस में यह मामला फंसा हुआ है। टिंबर का काम करने वाले लोगों को लायसेंस लेना अनिवार्य है। इस लायसेंस शहरी सीमा के लिए ही दिया जाता है। इससे शहर के भीतर ही टाल खोला जा सकता है। उधर, शहर से बाहर जाने पर वन विभाग का नियम हावी हो जाता है, जहां वन सीमा से टाल करीब २० किलोमीटर दूर होना चाहिए। ऐसी स्थिति में शहरी सीमा से बाहर भी टाल नहीं ले जाया जा सकता है।
कई बार टिम्बर पार्क बनाने सहमति बनी है, लेकिन प्रस्ताव भेजकर मामला शांत हो जाता हैै। टिम्बर हब हम भी चाहते हैं।
- उमेश परमार, सचिव, टिम्बर एसोसिएशन
प्रकरण-1
मदनमहल दश्मेशद्वार के समीप घनी बस्ती में आदर्श ट्र्रेडिंग कंपनी में आग लग गई थी। आग लगने से पूरा टाल खाक हो गया था। आग के दौरान वहां की पूरी बस्ती खाली कराई गई थी। करीब २१ गाड़ी पानी डालकर आग को काबू किया गया था।
प्रकरण-2
सूपाताल के एकता चौक पर सेठ सुभाष जायसवाल से लगे कुक्कू के टाल में आग लग गई थी। आग की चपेट में चार दुकानें आ गई थी। आग बुझाने में तीन दिन लगे थे। यहां आग की प्रचंडता को देखते हुए आसपास की बस्ती खाली कराई गई थी।
लकड़ी के टाल
350 - छोटे-बड़े आरा मशीन
300 - शहर और देहात के टिंबर क्षेत्र
07 - छोटी लाइन, मदनमहल, शारदा चौक, गढ़ा, बीटी तिराहा, रांझी, पनागर
Published on:
17 Apr 2018 12:21 pm
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