
hindi diwas ka mahatva and celebration 2017
जबलपुर। मोबाइल की भाषा बनी हिंग्लिश धीरे-धीरे आम बोलचाल की भाषा भी बनती जा रही है। ऐसी अंग्रेजी मिश्रित हिंदी का सालों पहले जबर्दस्त विरोध किया गया था। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए अथक प्रयास करने वालों में अग्रगण्य रहे जबलपुर के सांसद साहित्यकार सेठ गोविंददास ने इस मिश्रण का शुरु से विरोध किया। वे हिंदुस्तान व हिन्दी के सुरताल में अंग्रेजी भाषा के संगीत मिश्रण के धुर विरोधी थे। क्षेत्रीय भाषाओं को अलग-अलग राज्यों की शासकीय भाषा का अधिकार देने के प्रस्ताव पर हुई चर्चा के दौरान संसद में दिया गया सेठ गोविंददास का भाषण हिन्दी के विकास में मील का पत्थर माना जाता है। हिन्दी हित में उनके गर्जित स्वर आज भी हिन्दी प्रेमियों के लिए जीवंत व आदर्श हैं।
हिंदी के लिए समर्पित जीवन
हि न्दी भाषा के विकास और राजभाषा आंदोलन में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार सेठ गोविंददास का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने न केवल साहित्य साधना की, बल्कि अपने राजनीति प्रभाव से हिन्दी को राजभाषा बनाने में ध्वजवाहक भी रहे। भारतेंदु हरीशचंद्र, बाबू पुरुषोत्तमदास टंडन के साथ सेठ गोविंददास ही एेसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दी के लिए समर्पित कर दिया था। सबसे पहले हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने का प्रयास आरंभ करने वालों में सेठ गोविंददास का नाम हमेशा सबसे पहले और आदर के साथ लिया जाता है।
सौ साल पहले ही बना दिया नियम
सन् १९१० में काशी की नागरी प्रचारिणी सभा ही देश में हिन्दी की एकमात्र ध्वजवाहक संस्था थी। हिन्दी को देश की राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए उसी समय आंदोलन शुरू हुआ। १० अक्टूबर १९१० को प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन नागरी प्रचारिणी सभा के परिसर में ही हुआ। इसकी प्रथम नियमावली में ही हिन्दी को देश की राजाभाषा व देवनागरी लिपि को राजकीय लिपि घोषित कर दिया गया। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय इस सम्मेलन के सभापति थे। सेठ गोविंददास ने सम्मेलन में सबसे पहले हिन्दी को नियमावली में शामिल करने का प्रस्ताव रखा। इसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया और हिन्दी को राष्ट्रभाषा व देवनागरी को राष्ट्रीय लिपि घोषित कर दिया गया। इस सम्मेलन में राजर्षि बाबू पुरुषोत्तमदास टंडन, रामधारी सिंह दिनकर, डॉ राजेंद्र प्रसाद जैसे विद्वान मौजूद थे।
प्रारूप में करा लिया था शामिल
सेठ गोविंददास ने डा. भीमराव अंबेडकर को हिन्दी को राजभाषा बनाने के पक्ष में जोरदार तर्क दिए। उनके प्रभाव में संविधान के प्राथमिक ड्राफ़्ट में इस प्रस्ताव को सम्मिलित कर लिया गया। हालांकि बाद में क्षेत्रवाद के चलते संविधान सभा की बैठक में अंग्रेजी को देश की राजभाषा बना दिया गया।
संसद में विरोधियों पर तीखा प्रहार
‘जिस भाषा ने स्वाधीनता संग्राम में पूरे देश को एकसूत्र में पिरो दिया, उसे कमजोर नहीं माना जा सकता। इसी बात से यह अनुमान लगा लेना चाहिए कि यह कितनी शक्तिशाली भाषा है। हिंदी की वर्णमाला की आधी भी नहीं है अंगे्रजी की वर्णमाला। हिंदी का उद्गम संस्कृत से हुआ है, भारत में प्रचलित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत ही है। एक मां से उत्पन्न बच्चों में अधिक सामंजस्य होगा या अलग-अलग माताओं की संतानों में? यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के एक तिहाई से अधिक लोगों की भाषा को अपने ही देश में राजभाषा का दर्जा पाने के लिए याचना करना पड़ रहा है।’
राजभाषा नहीं तो सम्मान भी नहीं
सेठ गोविंददास को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए १९६१ में पद्मभूषण सम्मान से अलंकृत किया गया। लेकिन, १९६८ में संविधान के अनुच्छेद ३४३ में संशोधन का प्रस्ताव पारित होने से हिंदी को राजभाषा बनाने का उनका स्वप्न अधूरा ही रह गया। इससे खिन्न होकर उन्होंने यह सम्मान उसी वर्ष सरकार को लौटा दिया।
संशोधन के विरोध में दिया वोट
१९६२ में सत्तासीन कांग्रेस ने संसद में एक विधेयक प्रस्तुत किया। इसमें अंग्रेजी को देश को जोडऩे वाली भाषा बताते हुए इसे राजकीय भाषा बनाने की बात कही गई। इस प्रस्ताव के अंतर्गत राज्यों को अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को भी दूसरी राजकीय भाषा बनाने का अधिकार दिया जाना था। कांग्रेस के पक्के समर्थक होने के बावजूद सेठ गोविंददास इस बात को पचा नहीं पाए। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से इस सम्बंध में चर्चा की, लेकिन नेहरू व गोविंददास में सहमति नहीं बन पाई। उन्होंने इसे जनतांत्रिक अधिकार निरूपित करते हुए नेहरू से अपना मत प्रकट करने की अनुमति मांगी। बताया जाता है कि दोनों के बीच इसे लेकर मनमुटाव भी हो गया था, लेकिन नेहरू को सेठ गोविंददास की जिद के आगे झुक कर उन्हें विरोध दर्ज कराने की अनुमति देनी पड़ गई। संसद में संविधान के अनुच्छेद ३४३ में प्रस्तावित इस संशोधन के खिलाफ मत देने वाले वे इकलौते सांसद थे।
Published on:
14 Sept 2017 01:33 pm
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