
mala devi
अब भी नवरात्र पर पूजन के लिए आते हैं रानी के वंशज, चैत्र नवरात्र पर कल्चुरिकालीन प्रतिमा के दर्शन को उमड़ेंगे श्रद्धालु
जबलपुर।
संस्कारधानी के शक्तिपीठों में गढ़ा पुरवा में स्थित माता माला देवी के मंदिर का नाम अग्रणी है। मन्दिर में स्थापित ऐतिहासिक 12 वीं शताब्दी में निर्मित माला देवी की प्रतिमा दिन में तीन बार अपने आप रंग बदलती है। इसका रहस्य आज तक सुलझ नहीं पाया। पुरातत्व विद इसे प्रतिमा के पत्थर की विशेषता से जोड़कर देखते हैं, वहीं श्रद्धालु इसे देवी माँ का प्रताप और चमत्कार मानते हैं। इतिहासकार मानते हैं कि कल्चुरि राजवंश के शासनकाल में इसकी स्थापना की गई थी।गोंड शासकों ने मालादेवी को अपनी कुलदेवी के रूप में माना। मान्यता है कि गोंडवाना साम्राज्य की साम्राज्ञी रानी दुर्गावती इस मंदिर में पूजन करने आती थीं। रानी के वंशज अब भी नवरात्र पर पूजन करने मंडला से यहां आते हैं। दोनों नवरात्र में यहां पूजन के लिए भक्त उमड़ते हैं। चैत्र नवरात्र पर यहां 22 से 30 मार्च तक श्रद्धालुओं की कतार लगेगी।
बस्ती में विराजी है माँ -
गढ़ा बाजार से धन्वन्तरी नगर जाने वाले मार्ग पर पुरवा चुंगी चौकी, पुरवा झंडा चौक के समीप बखरी क्षेत्र में यह माता का यह मंदिर स्थित है। क्षेत्रीय बुजुर्गजन बताते हैं कि प्राचीन मंदिर का अब कोई अस्तित्व नहीं है। पहले मूर्ति एक पेड़ के नीचे रखी थी। बाद में एक मन्दिर बनवाकर इसे स्थापित किया गया।ब तीन दशक पहले तक मंदिर के आसपास काफी खुली जगह और मैदान था। अनदेखी के कारण अतिक्रमण बढ़ता गया और माता का यह मंदिर बस्ती के अंदर आ गया। यहां तक जाने के लिए एक सकरा सा रास्ता ही शेष बचा है। वैसे तो यह प्रतिमा पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है, लेकिन सभी कुछ कागजों पर चल रहा है, इसकी देख रेख कोई नहीं करता।
महालक्ष्मी का अवतार -
इतिहासविद डॉ आनन्द सिंह राणा ने बताया कि माला देवी गोंड राजाओं की कुलदेवी हैं।मदनमहल किले में प्रवास के दौरान रानी दुर्गावती स्वयं रोज यहां पूजन करने के लिए आती थीं। माला देवी को महालक्ष्मी देवी का ही एक रूप माना गया है। मान्यता है कि मालादेवी के पूजन और आराधना से सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है। रानी दुर्गावती भी इस सत्य को जानती थीं। उस दौर में भी नवरात्र पर यहां विशेष पूजन होता था।
रहस्य बना रंग बदलना-
मूर्ति के रंग बदलने का रहस्य आज भी पहेली बना हुआ है। दूर दूर से लोग इस प्रतिमा को देखने के लिए आते हैं। गढ़ा निवासी अधिवक्ता अर्जुन साहू का कहना है कि सूर्योदय के समय माला देवी की प्रतिमा में लाल रंग की आभा दिखाई देती है। दोपहर में मूर्ति का रंग थोड़ा श्यामल हो जाता है। शाम को प्रतिमा पीली नजर आती है। स्थानीय निवासी रूपकिशोर प्यासी का कहना है कि लोग इसे चमत्कार मानते हैं। पुरातत्वविदों का मानना है कि प्रतिमा एक विशेष प्रकार के पत्थर से बनी है। पत्थर के गुण की वजह से ही रंग बदला दिखाई देता है। इस पर रिसर्च भी चल रही है, लेकिन इसमें अभी कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई है ।
कलचुरि काल की प्रतिमा-
इतिहाकार डॉ राणा के अनुसार माला देवी की प्रतिमा कल्चुरिकाल (गोंड़काल के पहले) में बनी है। उस समय इसी तरह की प्रतिमाएं बनाई जाती थीं। कल्चुरी वंश वास्तव में हैहय क्षत्रिय वंश कहलाता था। इनकी राजधानी त्रिपुरी यानी जबलपुर के समीप स्थित तेवर थी। कल्चुरी वंश के बाद गोंडवाना काल आया। गोंड शासकों ने भी इस प्रतिमा की गरिमा का ध्यान रखा और कुलदेवी के रूप में इनका पूजन किया।
भक्तों की लगती है कतार-
चैत्र नवरात्र पर मालादेवी मंदिर में सुबह से ही जल चढ़ाने का क्रम शुरू हो जाता है, जो पूजन वंदन के साथ देर रात तक चलता है। बताया गया है यहां सूरजताल के समीप गोंडवाना काल की और भी धरोहरें मौजूद हैं। इनका अस्तित्व भी संकट में है।क्षेत्रीय निवासियों का कहना है कि पुरातत्व विभाग के अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को इन धरोहरों के संरक्षण की दिशा में सक्रिय कदम उठान चाहिए।नवरात्र भर मन्दिर में जवारे रखे जाते हैं व अन्य धार्मिक आयोजन होते हैं।
चोरी हो गई थी प्रतिमा-
प्रतिमा के पुरातात्विक महत्व को देखते हुए मूर्ति तस्कर गिरोह की नज़रें इस मूर्ति पर थीं। लगभग 25 वर्ष पूर्व यह मूर्ति चोरी हो गई थी। क्षेत्रीय नागरिक डॉ बीपी अवस्थी ने बताया कि तस्कर उक्त मूर्ति को मुंबई के जरिए विदेश ले जाकर बेचने की फिराक में थे। इसके पूर्व ही क्षेत्रवासियों व तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के अथक प्रयास से मूर्ति बरामद कर ली गई । दोबारा इसे पूरे विधिविधान से स्थापित किया गया।डॉ अवस्थी ने बताया कि हर नवरात्र में गोंड शासकों के वंशज यहां आकर विशेष पूजन करते हैं।
Published on:
17 Mar 2023 12:25 pm
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