
ADj anjali pare
जबलपुर। मन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना और संकल्प पक्का हो तो कोई भी व्यक्ति मनचाहा मुकाम हासिल कर सकता है। यह कहना है धनी की कुटिया के समीप अधारताल निवासी ३८ वर्षीय अंजली पारे का। उनका चयन जिला सत्र न्यायाधीश पद के लिए हुआ है। अंजली जबलपुर की पहली महिला अधिवक्ता हैं जिनका चयन इस अहम पद पर हुआ है। खास बात ये भी है कि सफल गृहणी की भूमिका निभाते हुए उन्होंने एक ही बार में इस परीक्षा का उत्तीर्ण किया है, जो अन्य युवाओं के लिए एक उदाहरण भी है। पत्रिका से बातचीत में अंजली ने कहा कि बस एक छोटी सी तमन्ना ने उन्हें इस महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंचाया।
यह छोटी सी आशा
अंजली ने बताया कि कहा कि जब वे बाजार जाती थीं तो अक्सर उन्हें अनुभव होता था कि कई दुकानदार जनता को गुमराह करते हैं। कुछ सरकारी दफ्तरों में भी यही हाल दिखा कि लोगों को वेवजह भटकाया जाता है। कारण यह था कि लोगों को अपने अपने अधिकारों और कानून की जानकारी नहीं थी। उनके मन में सवाल उठा कि कानून व अधिकारों की जानकारी होना बेहद जरूरी है। बस इसी छोटे से सवाल ने उनका मन वकालत की तरफ मोड़ दिया। माइक्रो बायोलॉजी से एमएससी करने के बाद भी उनके मन में यह कशक रही कि एक दिन वकालत जरूर करना है।
बुलंद रहा इरादा
पीजी तक पढ़ाई के बाद सन् २००३ में अधारताल जबलपुर निवासी छायाकार पंकज पारे के साथ उनका विवाह हो गया, लेकिन अंजली के मन में कानून की जानकारी हासिल करने की बात बनी रही। शादी के बाद उन्होंने न केवल एलएलबी और एलएलएम किया बल्कि सीनियर अधिवक्ताओं के मार्गदर्शन में उन्होंने जबलपुर जिला न्यायालय व हाईकोर्ट में प्रेक्टिस भी शुरू कर दी। फैमिली कोर्ट में वकालत करते हुए उन्होंने कई मामलों में बेहतरीन उदाहरण पेश किए। अंजली के कदम यहां भी नहीं रुके। ९ वर्षीय पुत्र और परिवार की जिम्मेदारी के बीच उन्होंने फेमिली कोर्ट में आने वाली समस्याओं पर पीएचडी भी शुरू कर दी, जो अब अंतिम चरण में है। इसके पूर्व उन्होंने रादुविवि में अतिथि विद्वान के पद पर और खालसा कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया।
जब दुखता था दिल
अंजली ने बताया कि उनका ९ वषीय बेटा फिजिकली चेलेंज्ड है। उसका हार्ट सही काम नहीं कर रहा था। एक तरफ ममता थी तो दूसरी ओर लक्ष्य को हासिल करने का इरादा। इसी मजबूत इरादे और जज्बे के बीच उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी घर में मां, कॉलेज में वकालत छात्रा और फिर अतिथि विद्वान यानी टीचर की भूमिका को बखूबी निभाया। संघर्ष में उनकी तब जीत भी हुई जब वकालत की डिग्री उनके हाथों में आयी और उन्होंने कोर्ट में प्रेक्टिस भी शुरू की। पति पंकज पारे के सहयोग ने उन्हें सतत हौसला दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता आरके सिंह सैनी का मार्गदर्शन भी उनके सफलता की सीढ़ी बना।
पहले प्रयास में ही सफल
वकालत करते हुए अंजली ने सन् २०१७ पहली बार एडीजे की परीक्षा में एप्लाय किया, तो सफलता ने उनके हौसले को सलाम किया। पहली ही बार में वे प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार में पास हो गईं। इसके साथ ही वे एडीजे की परीक्षा में सफल होने वाली जबलपुर की पहली महिला वकील बन गईं। इस गौरव की खुशी जबलपुर से लेकर उनके मायके भोपाल तक मनायी गई। मां व भाभी के साथ पुरातत्व विभाग में कार्यरत भाई आशुतोष उपरीत ने बहना को मंदिर ले जाकर प्रसाद का वितरण कराया। जबलपुर में भी मिठाईयां बांटीं गईं। अपनी सफलता का श्रेय वे ईश्वर की कृपा को देती हैं।
कुछ मुश्किल नहीं
पहली ही बार में एडीजे की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली अंजली का मानना है कि मन में दृढ़ संकल्प हो तो दुनिया की हर वस्तु हासिल की जा सकती है। उन्होंने कहा कि न्याय जगत में आने की इच्छा रखने वाले युवाओं को एलएलबी की पढ़ाई गंभीरता से करनी चाहिए। इसी में सफलता का रहस्य छिपा है। जरूरी है कि संविधान की धाराओं व अन्य आवश्यक चीजों को थ्योरी तक सीमित नहीं रखें। घटनाओं का अध्ययन करके इनके अर्थ को भी समझें। सफलता खुद ब खुद पास आ जाएगी।
स्कूल शिक्षा में शामिल हो लॉ
अंजली ने कहा कि वकालत, संविधान की धाराओं व नागरिक अधिकारों की जानकारी को स्कूल शिक्षा में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि बच्चे अपने अधिकारों व कत्र्तव्यों को प्रारंभ से ही समझ सकें। लॉ की पढ़ाई में कैरियर भी अच्छा है, क्योंकि यह पढ़ाई सार्वभौमिक है यानी जो एमपी में है वही नियम और धाराएं अन्य राज्यों में भी मान्य है। यह ऐसा पेशा है जिसे जीवन के अंतिम समय यानी वृद्धावस्था तक जारी रखा जा सकता है।
बहू को समझें बेटी
अंजली फैमिली कोर्ट की समस्याओं पर पीएचडी भी कर रही हैं। एक सवाल पर उन्होंने कहा कि ईगो ही परिवारों में विखंडन और संबंध विच्छेद की वजह बन रहा है। शादी शुदा बेटी के परिवार में मायकों वालों का अनावश्यक हस्तक्षेप और ससुराल वालों द्वारा बहू को बेटी जैसी नजर नहीं देखा जाना भी इसकी मूल वजह है। बहू को यदि बेटी जैसा समझ लिया जाए तो परिवारों में कलह या विवाद की हर समस्या खत्म हो जाएगी। बहू को बेटी जैसा प्रोत्साहन मिले तो गृहणी की भूमिका निभाते हुए भी वह कई बेहतर कार्य कर सकती है।
हर हाल में न्याय
जबलपुर से पहली महिला एडीजे बनीं अंजली का मानना है कि हर अधिवक्ता अपने पक्षकार के पक्ष को कोर्ट के समक्ष मजबूती से रखने का फर्ज निभाता है। जज की भूमिका ये है कि उसमें से सत्य को खोज निकाले और वास्तविक रूप से पीडि़त व्यक्ति को राहत दिलाए। उन्होंने कहा कि ईश्वर की कृपा से मैं इस भूमिका को विधि सम्मत ढंग से निभाने का हर संभव प्रयास करूंगी।
Published on:
14 Oct 2017 09:31 pm
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