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जबलपुर. 'करगिल युद्ध में चारों तरफ से गोलियों की गूंज सुनाई देती थी। कब, कौन-सी गोली किसे लग जाए, पता नहीं था। इसके बावजूद हमारे सैनिकों ने हिम्मत नहीं हारी। कई जवान शहीद हुए, लेकिन दुश्मनों के कब्जे से भारत भूमि को आजाद करा लिया। यह जीत अकेले सैनिक की नहीं, बल्कि पूरे देश की थी। हम तो मोर्चे पर दुश्मन से लड़ रहे थे, लेकिन पूरा देश हमारे साथ खड़ा था। यही हमारी सबसे बड़ी ताकत थी।' 22 वीं ग्रेनेडियर्स में सूबेदार रहे रामपुर निवासी आरके पात्रा ने बताया कि वे द्रास सेक्टर में तैनात थे। उन पर अपनी पलटन के साथ सैनिकों को एमुनेशन पहुंचाने और अन्य कार्यों में सहयोग करने की जिम्मेदारी थी। इसमें जम्मू एंड कश्मीर के लोगों ने खूब मदद की। संचार और सूचना देने में भी सहयोग किया। लड़ाई में हमारे कई जवान शहीद हुए। इस दर्द का अहसास आज भी होता है। फौजी का जीवन अनुशासित होता है। उसे यही सिखाया जाता है कि असंभव कुछ भी नहीं है।
कई दोस्त खोए
पात्रा ने बताया कि करगिल युद्ध में कई दोस्त खोए। लेकिन, आज भी उनकी याद आती है। दुश्मन चोटी पर बैठकर वार कर रहा था। उनसे लडऩा थोड़ा कठिन जरूर था, लेकिन असम्भव नहीं था। इस लड़ाई में किसी ने अपना बेटा तो किसी ने पति खोया और किसी ने भाई। लेकिन, उन्होंने अपने कर्तव्यों को नहीं छोड़ा। नई पीढ़ी को उन सैनिकों से सबक लेना चाहिए। बकौल पात्रा करगिल युद्ध एक इतिहास है। इसमें हमारे दोस्तों की कुर्बानियों की वीरगाथा है। जब भी मौका मिलता है, शहीदों के परिवार के सदस्यों से मिलता हूं। बच्चों से मिलकर उनकी समस्या को सुनता हूं।
Published on:
26 Jul 2019 02:14 pm
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