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Gig worker जानिए कैसे बन गए किक वर्कर

- कानूनी कवच से दूर देश के 77 लाख गिग वर्कर्स - मध्यप्रदेश में चार लाख डिलीवरी ब्वॉय, जिन्हें न छुट्टी न सामाजिक सुरक्षा जबलपुर। एक पखवाड़े पहले इंदौर में ऑनलाइन खाने की डिलीवरी देने जा रहे युवक सुनील वर्मा की चाकू से गोदकर हत्या कर दी गई। इसी शहर में साल भर पहले नशे में धुत्त लड़कियों ने डिलीवरी मैन देवीलाल की कार से कुचलकर जान ले ली थी। वह परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे।

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delivery boy at the work

उनके परिवार को सहानुभूति और सांत्वना तो मिली पर मदद नहीं। सुनील और देवीलाल जैसे देश के 77 लाख से अधिक युवा जानलेवा जोखिम भरा काम करने के बाद भी कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हैं। मध्यप्रदेश में इनकी संख्या चार लाख के पार है। यह बिजनस मॉडल रेगुलेट नहीं होने के कारण हालत यही हे कि हिसाब चुकता, चलते बनो।


यह नए दौर की नौकरी है, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन फूड सहित बड़ी संख्या में ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं, जहां युवा सेवा के बदले कमाई कर रहे हैं। इस काम में हजारों कंपनियां जुट गई हैं। जो डिलीवरी ब्वॉय के जरिए जरूरत की हर चीज ऑनलाइन डिमांड पर घर बैठे भेज रही हैं। इस प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले युवाओं को गिग वर्कर कहा जाता है। जिनके न काम के घंटे तय हैं और न ही निश्चित मानदेय। ऑर्डर और डिलीवरी ही इनका मेहनताना है। स्थाई नौकरी की श्रेणी में नहीं आने के चलते ऐसे युवा सामाजिक सुरक्षा के दायरे से भी बाहर हैं। लोकसभा में केंद्रीय श्रम व रोजगार राज्यमंत्री रामेश्वर तेली ने स्वीकार किया है कि इस क्षेत्र में काम करने वाली हजारों कंपनियां व 77 लाख से अधिक कामगारों के रेगुलेशन के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।

2030 तक होंगे ढाई करोड़ गिग वर्कर
सरकार का अनुमान है कि जिस तरह से ऑनलाइन ऑर्डर और डिलीवरी की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में 2030 तक गिग वर्कर की संख्या ढाई करोड़ तक पहुंच सकती है। मध्यप्रदेश में भी यह दायरा चार लाख से बढ़कर 20 लाख के पार जा सकता है। साफ है कि जिस काम में युवाओं की इतनी बड़ी फौज लगनी है, उनके लिए किसी तरह का सपोर्ट सिस्टम अभी तक तैयार नहीं हो पाया है।

मझधार में परिवार
गिग वर्कर्स का सबसे अधिक जोखिम भरा काम इसलिए है क्योंकि उन्हें हर वक्त सक्रिय रहकर बाइक व दूसरे साधनों से डिलीवरी देनी होती है। इसलिए वे हादसे का भी शिकार होते हैं। गिग वर्कर्स के लिए लगातार आवाज बुलंद कर रहे जबलपुर के सौरभ शर्मा संगठन बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ई कॉमर्स व दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले युवाओं का कोई नहीं है। हादसे के शिकार होने पर किसी तरह की मदद नहीं मिलती है। कंपनियां जनाक्रोश को देखकर वादा तो कर देती हैं, लेकिन उनपर बंधन नहीं होने से दबाव नहीं बन पाता है। शर्मा कहते हैं कि यह हास्यास्पद है कि जिस काम में लाखों लोग लगे हुए हैं, उनके लिए किसी तरह के नियम कायदे ही नहीं हैं।


जिल्लत भी बर्दाश्त
शर्मा कहते हैं कि रोजगार का संकट है, इसलिए युवा कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। लेकिन डिलीवरी के दौरान उन्हें अपमान का भी सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए जबलपुर में अप्रेल महीने में एक महिला ने डिलीवरी ब्वॉय की सरेआम चौराहे पर चप्पल से पीटा था। उसका कसूर केवल इतना था कि जाम में उसकी बाइक महिला के वाहन से टच कर गई थी। वहीं, प्रदेश व देश के कई हिस्सों से ऐसे वीडियो सामने आए थे जिसमें धार्मिक व जातिगत आधार पर अपमानित किया गया था।

महंगाई ने किया बेजार
गिग वर्कर के तौर पर काम करने के लिए अगर युवा आकर्षित हो रहे हैं तो इसकी दो वजहें हैं। एक तो उन्हें नौकरी नहीं मिल रही, दूसरे काम की आजादी। काम करने या छोडऩे को लेकर कोई पाबंदी नहीं है। लेकिन फूड डिलीवरी कंपनी के लिए काम करने वाले एक युवा नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि आजादी तो सुनने भर की है। उन्हें निश्चित समय पर तीन घंटे हिलने की छूट नहीं है। ऑर्डर मिले या नहीं मिले, उस दौरान अलर्ट पर रहना ही पड़ता है।

कुल कामगारों का 7 फीसदी
गिग वर्कर्स का दायरा और छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक भी फैल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कुल कामगारों की संख्या का 7 प्रतिशत हिस्सा गिग वर्कर का पहुंच गया है। जो जल्दी ही 20 प्रतिशत से ऊपर पहुंच जाएगा। लेकिन इनके लिए न तो मजदूरी का नियम है और न ही काम के घंटे तय हैं। केंद्र सरकार ने भी माना है कि एग्रीगेटर को कुल व्यवसाय का एक से दो फीसदी कामगारों के सामाजिक सुरक्षा के लिए अंशदान तय करने का प्रावधान किया गया था। लेकिन गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों से संबंधित संहिता के उपबंधों के लागू नहीं होने के कारण किसी भी योजना को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।