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true love story: भाई के बिस्तर पर 4 साल से पहरा दे रही बहन, दिल को छू लेगी यह दास्तां

भाई की सेवा के लिए बहन ने अस्पताल को ही बना लिया अपना संसार, पिछले चार साल कर रही है भाई की सेवा

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Prem Shankar Tiwari

Aug 07, 2017

जबलपुर। रिश्तों की डोर और इसकी मिठास को कुछ दिलदार लोग और मानवता के पुजारी ही सम्हालकर रखे हुए हैं। नेक दिल लोगों की इसी फेहरिश्त में वक्त ने लायची बाई का नाम भी शुमार दिया है। यह बहन, सड़क हादसे में घायल अपने भाई की न केवल पिछले ४ साल से सेवा कर रही है। बल्कि उसकी हर पल की पहरेदार और साया बनी हुई है। वार्ड में भाई के पलंग के समीप बैठी लायची बाई ने अस्पताल के घेरे को ही अपना संसार बना लिया है। जब दुनिया ने साथ छोड़ दिया तब भी वह भाई के साथ खड़ी नजर आ रही है। उसे जीने का हौसला दे रही है। लायची बाई को फख्र है कि वह एक मां की कोख से जन्मे अपने भाई के काम आ रही है। इस बहन पर भाई नारायण ही नहीं बल्कि सभी को गर्व है।


अस्पताल में ही राखी
भाई-बहन के अटूट रिश्ते की डोर को लाइचीबाई सरीखी बहनें मजबूती दे रही हैं। सड़क हादसे में रीढ़ की हड्डी में चोट आने से अपाहिज हुए इकलौते भाई नारायण की सेवा में चार साल मेडिकल कॉलेज में गुजार दिए। भाई को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा। मेडिकल कॉलेज से चंद कदम की दूरी पर अधुंआ है। यह दूरी भी तीन से चार महीने में कुछ घंटों के लिए ही तय कर पाती हैं। रक्षाबंधन का जिक्र करते ही वे शून्य में निहारने लगीं। उनके कंठ से यही निकला 'चार साल से इसी वार्ड में राखी बांध रही हूं। भाई की हालत देख पता नहीं कब ये डोर टूट जाए।Ó


सड़क हादसे का शिकार
लायचीबाई ने पत्रिका को बताया कि संयोग से मेरी शादी भी अंधुआ में हुई। ६० साल की दहलीज पर पहुंच चुके लाइचीबाई और नारायण की उम्र में एक साल का अंतर है। सिर से माता-पिता का साया उठा तो भाई की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। चार साल पहले अंधुआ के पास कार एक्सीडेंट में नारायण की कमर व गदर्न की हड्डी टूट गई। वे उठ-बैठ नहीं पाते। साल भर पहले बेडसोल हुआ। आज तक घाव नहीं भरा। बिस्तर पर ही भोजन-पानी व दैनिक नित्यक्रिया करानी पड़ती है। घाव से दुर्गंध आती है। इस हालात में भी भाई को एक क्षण के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती। यूं कहें कि वह मां जैसी भूमिका निभाते हुए भाई पर पूरा वात्सल्य उड़ेल रही हैं।

मुस्लिम भाईयों की अनूठा जज्बा

रेशम की डोर ने **** भाइयों को हिन्दू बहनों की अटूट डोर में बांध दिया। बचपन में रेशम के धागे से जुड़ा अटूट रिश्ता आज भी कायम है। लगभग 25 वर्षों से ये **** भाई हिन्दू बहनों से राखी बंधवाते आ रहे हैं। साथ ही उनकी रक्षा का वचन भी दे रहे हैं। बहनें भी इस रोज पर भाइयों की लम्बी उम्र की कामना करती हैं। यह मिसाल पेश की है गुरंदी में रहने वाले महफूज खान, सरफराज खान, अयाज उर्फ अज्जू खान ने। महफूज और सरफराज ने बताया कि कई वर्ष पहले उन्हें पड़ोस में रहने वाली सुमन ने राखी बांधी थी। 10 साल पहले सुमन की शादी हो गई। सुमन ने जाते-जाते महफूज सरफराज और अन्य भाइयों से कहा कि अब राखी का यह रिश्ता उसके साथ उसकी भतीजी प्रीति भी निभाएगी। इसके बाद से सुमन की भतीजी प्रीति भी महफूज, सरफराज और अन्य भाइयों को राखी बांधने लगी। प्रीति के अलावा महफूज के घर के पास रहने वाली छाया और माया नामक दो सगी बहनें भी महफूज, सरफराज और अयाज को अपना भाई मानती हैं। वे हर साल रक्षाबंधन पर उनकी कलाइयों पर रेशम का धागा बांधती हैं।