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वर्षों की प्रक्रियानूसिंह पीठाधीश्वर महामंडेश्वर डॉ. स्वामी श्यामदास महाराज ने बताया कि अखाड़ों में भर्ती होने के तुरंत बाद से ही नागा साधुओं की परीक्षा शुरू हो जाती है। पहले उन्हें गुरु सेवा, जन सेवा का सबक सिखाया जाता है। ब्रम्हचर्य व्रत धारण कराया जाता है। जटिल प्रशिक्षण की अलग-अलख सीढिय़ों को चढ़ते हुए वर्षों बाद वह नागा साधु की श्रेणी में शामिल होता है। बाद में उसे संत, महंत जैसी अन्य उपाधियां प्राप्त होती जाती हैं।
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श्री निरंजनी अखाड़ा - यह अखाड़ा 826 ईस्वी में गुजरात के मांडवी में स्थापित हुआ था। इलाहाबाद, उज्जैन, हरिद्वार, पयंबकेश्वर व उदयपुर में इसकी शाखाएं हैं।
श्री जूना अखाड़ा - यह अखाड़ा 1145 में उत्तराखण्ड के कर्णप्रयाग में स्थापित हुआ था। इसे भैरव अखाड़ा भी कहते हैं। इसका केंद्र वाराणसी के हनुमान घाट पर माना जाता है। हरिद्वार में मायादेवी मंदिर के पास इनका आश्रम है। इ
श्री महानिर्वाण अखाड़ा - यह अखाड़ा 681 ईस्वी में स्थापित हुआ था। कुछ लोगों का मत है कि इसका उदय बिहार-झारखण्ड के बैजनाथ धाम में हुआ था, जबकि कुछ इसका स्थान हरिद्वार में नील धारा के पास मानते हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन, पयंबकेश्वर, ओंकारेश्वर और कनखल में हैं।
श्री अटल अखाड़ा - यह अखाड़ा 569 ईस्वी में गोंडवाना क्षेत्र में स्थापित किया गया। यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है। इसकी मुख्य पीठ पाटन में है लेकिन आश्रम कनखल, हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन व पयंबकेश्वर में भी हैं।
श्री आह्वान अखाड़ा - यह अखाड़ा 646 में स्थापित हुआ और 1603 में पुर्नसंयोजित किया गया। इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है। इसका आश्रम ऋषिकेश में भी है।
श्री आनंद अखाड़ा - यह अखाड़ा 855 ईस्वी में मध्यप्रदेश के बेरार में स्थापित हुआ था। इसका केंद्र वाराणसी में है। इसकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन में भी हैं।
श्री पंचाग्नि अखाड़ा - इस अखाड़े की स्थापना 1136 में हुई थी। इसका प्रधान केंद्र काशी है। इसकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में हैं।
श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा - यह अखाड़ा ईस्वी 866 में अहिल्या-गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी हैं। इनमें बारह पंथ हैं। यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है और इनकी पयंबकेश्वर शाखा पयंबकंमठिका नाम से प्रसिद्ध है।
श्री वैष्णव अखाड़ा - यह बालानंद अखाड़ा ईस्वी 1595 में दारागंज में श्री मध्यमुरारी में स्थापित हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी और खिाकी आदि तीन संप्रदाय बने। इनका अखाड़ा पयंबकेश्वर में मारुति मंदिर के पास था। पयंबकेश्वर का चक्रतीर्थ और नासिक में आज भी इनका स्थान है।
श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा - इस संप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासीन हैं। इनमें उदासीन साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, पयंबकेश्वर, भदैनी, कनखल, साहेबगंज, मुलतान, नेपाल व मद्रास में है।
श्री उदासीन नया अखाड़ा - इसे बड़ा उदासीन अखाड़ा के कुछ सांधुओं ने विभक्त होकर स्थापित किया। इनके प्रवर्तक मंहत सुधीरदासजी थे। इनकी शाखाएं प्रयागए हरिद्वार, उज्जैन, पयंबकेश्वर में हैं।
श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा - यह अखाड़ा सन् 1784 में स्थापित हुआ। इनकी ईष्ट पुस्तक श्री गुरुग्रन्थ साहिब है। इनमें साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या बहुत है। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और पयंबकेश्वर में हैं।
श्री निर्मोही अखाड़ा - निर्मोही अखाड़े की स्थापना 1720 में रामानंदाचार्य जी ने की थी। इस अखाड़े के मठ और मंदिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार में हैं। पुराने समय में इसके अनुयायियों को तीरंदाजी और तलवारबाजी की शिक्षा भी दिलाई जाती थी।