
merry christmas: Half a dozen old churches at jabalpur
जबलपुर . मध्यप्रदेश में ईसाइयों की संख्या ज्यादा नहीं हैं पर मिशनरियों के माध्यम से सालों पहले यहां कई सेवा कार्य शुरु किए गए थे। यहां आए ईसाइयों ने गिरिजाघर भी बनाए और धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती चली गई। महाकौशर्ल क्षेत्र के जबलपुर में तो अनेक चर्च बन गए। यहां कई पुराने और ऐतिहासिक महत्व के चर्च हैं। इतिहासकार बताते हैं कि छोटे-बड़े सभी मिलाकर यहां डेढ़ दर्जन से जयादा चर्च हैं।
शिक्षा की नींव स्थापित करने की मिसाल
संस्कारधानी का रोम-रोम इतिहास की कहानी बयां करता है। फिर चाहे वह किसी पर्व से जुड़ा हो या प्रार्थना स्थलों से जुड़ा हुआ हो। शहर में एेसा ही सुनहरा इतिहास गिरिजाघरों का भी है, जो हजारों साल से शहर के इतिहास को संजोये हुए हैं। कुछ चर्च शिक्षा की नींव स्थापित करने की मिसाल बन चुके हैं।
नाम- सेंट पीटर एंड पॉल चर्च, सदर स्थापना- सन् १८४०
इतिहास- १८४० में कैथोलिक मिशनरियों द्वारा बनवाया गया था। शुरुआत में आयरलैंड के ईसाई पुरोहित फादर मरफी ने इस जगह पर पहले छोटा सा प्रार्थना घर बनाया था। यहां सभी प्रभु यीशू की प्रार्थना के उपस्थित होते थे। १८५० में पटना के एपोस्टोलिक शहर आए, तो उन्होंने इसे सैन्य दल को समर्पित कर दिया। इसके बाद २२ जून को १८५८ इसे प्रार्थना घर के रूप में अभिमंत्रित किया गया। १८७१ में इस गिरिजाघर का भव्य निर्माण करवाया गया। इसके बाद से यह चर्चा में रहता है।
नाम- होली ट्रिनिटी चर्च, भंवरताल
स्थापना- १९३६
इतिहास- इस चर्च की आधारशिला १६ जनवरी १९३६ को बिशप सीके डबलमैन द्वारा की गई थी। यह चर्च शुरुआत से ही धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है।
पहले जहां चर्च था, अब लार्डगंज बसा है
नाम- क्राइस्ट चर्च
स्थापना- १८४३
इतिहास- जनवरी १८४१ में कोलकाता से धर्माध्यक्ष जबलपुर आए थे। उनके साथ इसी अवसर पर क्राइस्ट चर्च की शिलान्यास भी रखी गई थी। छोटे रूप में बने होने के कारण १८४४ तक यह प्रार्थनागृह के रूप में रहा है। इसके बार १८५८ में इसका निर्माण शुरू हुआ। इसी के साथ एक हिस्से में स्कूल की शुरुआत भी हो गई। पुराने समय में जहां चर्च था, वहां अब लार्डगंज थाना और आशीर्वाद मार्केट बन चुका है।
छोटे चर्चों की संख्या १८ है
- शहर के कई बडे़ चर्चों के अलावा धर्मावलम्बियों द्वारा स्थानीय लोगों की पहुंच आसान बनाने के लिए क्षेत्रों में ही कई छोटे गिरिजाघरों की स्थापना करवा दी गई है, जिनकी संख्या लगभग १८ है।
डॉ. आनंद सिंह राणा, इतिहासविद्
Published on:
20 Dec 2017 08:48 am
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