6 नवंबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

दहेज मामले में मिली कई राहतें, जमानत मिलने, पासपोर्ट जमा करने में छूट

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नियम में किए संशोधन. जिला अदालतों को जमानत अर्जियों पर सावधानी से विचार के निर्देश
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

जबलपुर

•

image

deepak deewan

•

Updated: 27 Nov 2017, 10:47 AM IST

big action of sc st act

एससी, एसटी केस में सरकार का बड़ा फैसला

जबलपुर. अब दहेज प्रताडऩा के आरोपियों की जमानत अर्जी महज इस आधार पर खारिज नहीं की जाएगी कि दहेज का सामान उनके कब्जे से जब्त हुआ। जमानत के ऐसे मामलों में विचारण न्यायालय आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका, प्रथम दृष्ट्या आरोपों की सच्चाई, आगे गिरफ़्तारी या अभिरक्षा की आवश्यकता व न्याय हित को दृष्टिगत रखते हुए सावधानीपूर्वक होगा। विदेश में रहने वाले भारतीयों के पासपोर्ट भी सामान्यत: जब्त नहीं किए जाएंगे। मप्र हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के परिपालन में अपने अधीनस्थ जिला एवं सत्र न्यायालयों को इस सम्बंध में औपचारिक आदेश जारी किए हैं।

हाजिरी के लिए रिश्तेदार नहीं होंगे मजबूर
जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार द्वारा जारी आदेश के अनुसार दहेज प्रताडऩा के आरोप में पति के परिवारजनों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होने ट्रायल कोर्ट द्वारा छूट दी जानी चाहिए। खासकर एेसे परिजनों को जो विचारण स्थान से दूर रहते हैं, उनकी उपस्थिति आवश्यक होने पर वीडियो कांफ्रेंसिंग से हाजिरी सुनिश्चित की जाए। इससे मामले की विचारण प्रक्रिया पर प्रभाव नहीं पडऩा चाहिए।
निचली अदालतों को जारी आदेश में कहा गया है एेसे मामलों में जमानत अर्जी लोक अभियोजन अधिकारी या शिकायतकर्ता को एक दिन के पूर्व नोटिस के साथ पेश करनी होगी। जमानत अर्जी पर यथासंभव प्रस्तुत किए जाने के दिन ही सुनवाई की जाएगी।


आदेश में कहा गया है कि सामान्य प्रक्रिया के तहत विचारण न्यायालय विदेश में रहने वाले भारतीयों के पासपोर्ट जमा नहीं कराएगी। साथ ही हाजिर न होने पर रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने जैसा गंभीर कदम भी नहीं उठाया जाएगा। देश के अन्य राज्यों में निवासी परिजनों की उपस्थिति के लिए विचारण न्यायालयों को वीडियो कांफ्रेंसिंग की सुविधा का इस्तेमाल करना चाहिए। जहां तक संभव हो, परिजनों को व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष हाजिर होने पर विवश नहीं किया जाएगा। सभी परिजनों से संबंधित मामलों को संयुक्त कर एक ही जज के समक्ष सुनवाई सुनिश्चित की जाएगी। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि गंभीर चोट या हत्या से संबंधित मामले में यह निर्देश लागू नहीं होंगे।