बालमीक पाण्डेय @ जबलपुर। कद मात्र 52 अंगुल.., छोटे-छोटे हाथ-पैर..., देह गोलमटोल, लेकिन ज्ञान का अथाह भंडार। हम बात कर रहे हैं संत राघवदास जी महाराज की, जिनकी लम्बाई तो तो महज एक बच्चे के बराबर है, लेकिन इनका वैदिक ज्ञान लोगों को अपनी ओर खींच लेता है। संतों का सानिध्य पाने के लिए वे अक्सर सत्संग के कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। साधु के वेष, कद काठी और महज 52 अंगुल की लम्बाई की खासियत के कारण लोगों ने अब इनका नाम ही वामन महाराज रख दिया है।
कंठस्थ हैं कई शास्त्र
कद छोटा होने के कारण दीक्षा के बाद संत राघवदास का नाम वामनजी महाराज पड़ा। उन्होंने प्रसिद्ध संत नृत्यगोपाल दास से दीक्षा ली थी। वामन महाराज मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि देश के कोने-कोने में जाकर सत्संग कर रहे हैं। उन्हें कई ग्रंथ कंठस्थ हैं। वामनजी ने कहा कि दंभ तथा अहंकार से जीवन में कुछ हासिल नहीं होता है और यह भी कि धन-संपदा क्षण भंगुर होती है।
सेवा है सर्वोपरि
जीवन के करीब 52 वसंत पार कर चुके संत राघवदास वामनजी महाराज भेड़ाघाट, 64 योगिनी मंदिर के समीप अपना भजनाश्रम बनाए हुए हैं। वामनजी 21 वर्षों में 1 हजार से अधिक कथा व धर्म सभाएं कर चुके हैं। भगवान की सेवा से जो भी अर्जन होता है उसे वे जन सेवा में लगा देते हैं।
देखने उमड़ती है भीड़
जब लोगों को इस बात की जानकारी लगती है की कथा में वामनजी महाराज यानी की बौने कद के महाराज आए हैं तो उनके दर्शन के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। वे भी बहुत ही सहज भाव से लोगों से मिलते हैं। वामनजी ने कहा कि सहजता ही मनुष्य का आभूषण है। केवल अच्छाई और नेक कार्य ही ऐसे हैं जो आदमी को दुनिया से जाने के बाद भी लोगों के मन में जीवित रखते हैं।
वामन अवतार की याद
वामन अवतार को भगवान विष्णु का पांचवां अवतार माना जाता है। यह विष्णु के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने देवलोक में इन्द्र का अधिकार पुन: स्थापित करने के लिए यह अवतार लिया। देवलोक पर असुर राजा बली ने कब्जा कर लिया था। अपनी तपस्या तथा ताकत के माध्यम से बली ने त्रिलोक पर आधिपत्य हासिल कर लिया था। वामन भगवान एक बौने ब्राह्मण यानी वामन के वेष में बली के पास गए और उनसे अपने रहने के लिए तीन कदम के बराबर भूमि देने का आग्रह किया। राजा बलि बड़े दानी थे। उन्होंने ब्राम्हण का आग्रह स्वीकार लिया। इसके बाद ब्राम्हण यानी वामनदेव ने दो डग में ही पूरी पृथ्वी व ब्राम्हांड को नाप लिया। अंतत: तीसरे कदम के लिए बालि ने अपना सिर पेश कर दिया और मुक्ति को प्राप्त हुआ।