जबलपुर। ध्यान और समाधि को अपने ही अंदाज में परिभाषित करने वाले ओशो बचपन में बेहद नटखट थे। उनके बचपन के किस्से अब भी लोगों के मन को गुदगुदाते हैं। ओशो के काफी करीब रहे सीएल जैन बताते हैं कि एक बार ओशो एक पड़ोसी की खाट ही उठाकर कुएं पर रखवा आए थे। इसके पीछे भी एक रोचक कहानी थी, जो जीवन की जीवंतता व निराकार ब्रम्ह की उपासना से जुड़ी थी।
हक्का-बक्का रह गया पड़ोसी जैन के अनुसार रायसेन के समीप कुचवाड़ा में ओशो का ननिहाल था। ननिहाल में पड़ोस में ही रहने वाला बालाजी नाम का व्यक्ति रोज सुबह-शाम तीन-तीन घंटे तक तेज आवाज में पूजन व भजन-कीर्तन करता था। ओशो ने बालाजी से पूछा, तुम भगवान से क्या मांगते हो? मेरे नाना कहते हैं कि तुम डरपोक हो इसलिए प्रार्थना करते रहते हो। बालाजी ने इनकार कर दिया। अगले दिन ओशो ने किसी तरह अपने चार पहलवान मित्रों को राजी कर लिया कि बालाजी को मजा चखाया जाए। तब ओशो अखाड़े में जाकर खुद भी कसरत करते थे। बालाजी अपनी बगिया में एक खाट बिछा कर सोते थे। पास ही एक कुआं था। आधी रात को उन चार पहलवानों ने, रजनीश के इशारे पर, सोते बालाजी की खाट उठा कर कुएं पर रख दी और सब लोग झाडिय़ों के पीछे छिप गए। फिर उनको जगाने के लिए पत्थर फेंके। जब बालाजी की नींद खुली और उन्होंने देखा कि वे कुएं पर है तो उनके मुंह से जोरदार चीख निकली। सारा अड़ोस-पड़ोस जग गया। चारों तरफ भी जमा हो गई। तब रजनीश ने बालाजी से पूछा- तुमने अपने भगवान को क्यों नहीं पुकारा? तुम हर रोज छह घंटे पूजा करते हो। संकट में तुम भगवान को तो भूल ही गए। बेचारे बालाजी छोटा सा मुहं लेकर वहां से चले गए।
नाना-नानी के लाड़-प्यार ने बिगाड़ाजैन व्यापारी परिवार में जन्मे ओशो तेरह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। इनका जन्म ननिहाल कुचवाड़ा में हुआ था और इनके नाना और नानी अमीर थे। वे जन्म से सात वर्षों तक उनके साथ रहे। ओशो ने कई बार खुद इस बात को स्वीकार है कि नाना-नानी के लाड़-प्यार ने इन्हें बिगाड़ा। ननिहाल में मनमर्जी से कुछ भी करने की इन्हें इतनी स्वतंत्रता मिली कि इनका स्वभाव जिद्दी हो गया। गांव के बड़े-बूढ़े और पड़ोसी इनसे परेशान थे। किशोर अवस्था में ओशो ने समाज के सभी स्थापित नियमों और स्वीकृत आचरण के ढांचों को चुनौती दे दी। इसमें यह किस्सा बहुत प्रसिद्ध है।
यह भी पढ़ें -
तर्क के जादूगर थे OSHO, प्रोफेसर की कर दी थी बोलती बंद