ये है माता का स्वरूप
पुराणों के अनुसार माता पार्वती का मुख उज्ज्वल और तेजमय है। गौर वर्ण होने के कारण इन्हें माता गौरी भी कहा जाता है। इनके आठ हाथों में त्रिशूल, पास, अंकुशा, शंख, चक्र, तलवार, कमल विद्यमान हैं। माता का वाहन वृषभ बताया गया है। सफेद वस्त्र धारण करने वाली ममतामयी स्वभाव वाली पार्वती को मां अम्बे भी पुकारा जाता है।
ऐसे प्रकट हुईं माता
पुराणों में बताया गया है कि एक बार सती अपने पिता प्रजापति दक्ष की ओर से आयोजित यज्ञ में शामिल होने गई थीं। वहां उनके पिता ने शिव के बारे में बहुत अपशब्द कहा था, जिसे सुनने के बाद क्रोध में आकर माता पार्वती ने पिता के यज्ञ कुंड में ही अपने आप को भस्म कर दिया था। इसके बाद शिव को पति रूप में पाने के लिए पार्वती रूप में जन्म लिया और कठोर तप से शिवजी की अर्धांगिनी बन गईं।
यह पूजन सामग्री जरूर रखें
भवानी मंदिर के पुजारी पं. जगदीश शर्मा के मुताबिक देवी मां की आराधना के लिए यह सामग्री जरूरी होती हैं। गणेशजी की मूर्ति के स्नान के लिए तांबे का पात्र, तांबे का लोटा, कलश, दूध, देव वस्त्र और आभूषण रखें। चावल, दीपक, तेल, रुई,कुमकुम, धूपबत्ती, अष्टगंध। गुलाब के फूल, प्रसाद के फल, दूध, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, शक्कर, पान, दक्षिणा।
यह है पूजा विधि
प्रथम पूज्य भगवान गणेश की पूजा किसी भी शुभ कार्य में करना चाहिए। सुखदाता, मंगलकारी और मनोवांछित फल के दादा गणेशजी को सर्वप्रथम पूजने का वरदान प्राप्त है। भगवान को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। गंध, पुष्प, अक्षत अर्पित करें। अब माता पार्वती का पूजन करें। माता पार्वती की मूर्ति भगवान शिव के बायीं तरफ स्थापित करना चाहिए। माता का आह्वान करें। पार्वती को घर में आसन दें। अब देवी को स्नान कराएं। जल से स्नान कराएं, फिर पंचामृत से और फिर स्वच्छ जल से स्नान कराएं। माता को वस्त्र अर्पित करने के बाद आभूषण पहनाएं। पुष्पमाला अर्पित करें। इत्र लगाकर तिलक करें। धूप और दीप जलाकर फूल और चावल अर्पित करें। घी या तेल का दीपक लगा सकते हैं। इसके बाद आरती करें। परिक्रमा के बाद नेवैद्य अर्पित करें।
पार्वती जी के मंत्र
पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए
‘ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः’’‘ऊँ गौरये नमः
‘ऊँ साम्ब शिवाय नमः’’’ऊँ पार्वत्यै नमः
घर में सुख- शांति के लिए
'मुनि अनुशासन गनपति हि पूजेहु शंभुभवानि।कोउ सुनि संशय करै जनि सुर अनादि जिय जानि'।
इच्छानुसार वर पाने के लिए
हे गौरी शंकरार्धांगी। यथा त्वं शंकर प्रिया।तथा मां कुरु कल्याणी, कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।
कार्य में सफलता के लिए
ऊँ ह्लीं वाग्वादिनी भगवती मम कार्य सिद्धि कुरुकुरु फट् स्वाहा।
इच्छित वर- वधू की प्राप्ति के लिए
अस्य स्वयंवरकलामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अतिजगति छन्दः, देवीगिरिपुत्रीस्वयंवरादेवतात्मनोऽभीष्ट सिद्धये मंत्र जपे विनियोगः।
घर में सुख-शांति हेतु इस मंत्र का जाप करें
मुनि अनुशासन गनपति हि पूजेहु शंभु भवानि।
कोउ सुनि संशय करै जनि सुर अनादि जिय जानि।।
पार्वतीस्तोत्रम् का करें पाठ
विबुधाधिपतेजिनीशकान्ते वदनाभाजितयामिनीशकान्ते .
नवकुन्दविराजमानदन्ते नलिनाभं प्रणमाम्यहं पदं ते || १ ||
विकचाम्बुरुहां विलासचोरैरतिशीतैः प्रवहद्दयाम्बुपूरैः .
शशिशेखरचित्तनृत्तरङ्गैस्तरसालोकय देवि मामपाङ्गैः || २ ||
अवनीधरनायकस्य कन्ये कृपणं मां परिपालयातिधन्ये .
विधिमाधववासवादिमान्ये द्रुतमुन्मूलितभक्तलोकदैन्ये || ३ ||
कुचनिन्दितशातकुम्भशैले मणिकाञ्चीवलयोल्लसद्दुकूले .
परिपालय मां भवानि बाले त्रिजगद्रक्षणजागरूकलीले || ४ ||
स्वरुचा जिततप्तशातकुम्भे कचशोभाजितकालमेघडम्भे .
परिपालय मां त्रसन्निशुम्भे मकुटोल्लासिसुधामयूखडिम्भे || ५ ||
कुसुमायुधजीवनाक्षिकोणे परितो मामव पद्मरागशोणे .
स्मरवैरिवशीकृतप्रवीणे चरणाब्जानतसत्क्रियाधुरीणे || ६ ||
गिरिजे गगनोपमावलग्ने गिरितुङ्गस्तनगौरवेण भुग्ने .
वस मे हृदये तवाङ्गलग्ने तव संदर्शनमोदसिन्धुमग्ने || ७ ||
सकलोपनिषत्सरोजवाटीकलहंस्यास्तव मे कवित्वधाटी .
कृपयाविरभूदियं तु पेटी वहतु त्वद्गुणरम्यरत्नकोटीः || ८ ||
|| इति श्रीपार्वतीस्तोत्रं संपूर्णम् ||