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Shakambhari Jayanti : इन मंदिरों में देवी को आज अर्पित करेंगे शाक-सब्जी, आप भी जानिए इसका रहष्य

शाकंभरी जयंती पर दुर्गा मंदिरों में विशेष पूजा की जा रही है। त्रिपुर सुंदरी मंदिर, बगुलामुखी देवी मठ के साथ ही अन्य सभी दुर्गा मंदिरों में भी पूजन-अर्चन शुरु

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Purnima

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जबलपुर . पौष पूर्णिमा के दिन को शाकंभरी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। देवी शाकंभरी को दुर्गा का अवतार माना गया है। शाकंभरी जयंती पर दुर्गा मंदिरों में विशेष पूजा की जा रही है। संस्कारधानी के त्रिपुर सुंदरी मंदिर, बगुलामुखी देवी मठ के साथ ही अन्य सभी दुर्गा मंदिरों में भी पूजन-अर्चन शुरु हो गया है। देवी शाकंभरी को शाक-सब्जी बहुत प्रिय है इसलिए आज के दिन उनकी प्रसन्नता के लिए देवी भक्त उन्हें शाक-सब्जी का भोग अर्पित करते हैं।
मां के इस अवतार की कथा इस प्रकार है कि जब प्राचीन काल में पृथ्वी पर सूखा पड़ गया और सौ वर्ष तक वर्षा नहीं हुई, तो चारों ओर सूखे के कारण हाहाकार मच गया। पृथ्वी के सभी जीव पानी के बिना प्यास से मरने लगे और सभी पेड़-पौधे, वनस्पति सूख गए। इस संकट के समय सभी ऋषि-मुनियों ने एक साथ मिलकर देवी भगवती की आराधना की। अपने भक्तों की पुकार सुनकर देवी ने पृथ्वी पर शाकंभरी नामक रूप में अवतार लिया व पृथ्वी को वर्षा के जल से सराबोर कर दिया। इससे पृथ्वी पर पुन: जीवन का संचार हुआ। चारों ओर हरियाली छा गई। अत: देवी के इस अवतार को शाकंभरी के रूप में पूजा जाता है और इस दिन को शाकंभरी पूर्णिमा या शाकंभरी जयंती के रूप में मनाया जाता है।


शाकंभरी का अवतार लेकर की अमृत वर्षा

तंत्र-मंत्र के साधकों को अपनी सिद्धि के लिए देवी शाकंभरी ेखास हैं । मां शाकंभरी ने अपने शरीर से उत्पन्न शाक-सब्जियों, फल-मूल आदि से संसार का भरण-पोषण किया था। इसी कारण माता 'शाकंभरीÓ नाम से विख्यात हुईं। तंत्र-मंत्र के जानकारों की नजर में शाकंबरी नवरात्रि को तंत्र-मंत्र की साधना के लिए अतिउपयुक्त माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शाकंभरी नवरात्र का पर्व प्रारंभ होता है, जो पौष मास की पूर्णिमा तक मनाया जाता है। पूर्णिमा तिथि पर माता शाकंभरी की जयंती मनाई जाती है। देवी शाकंभरी आदिशक्ति दुर्गा के अवतारों में एक हैं। दुर्गा के सभी अवतारों में से रक्तदंतिका, भीमा, भ्रामरी, शाकंभरी प्रसिद्ध हैं। श्री दुर्गासप्तशती में शाकुंभरी देवी का वर्णन आता है । कहते हैं कि शाकुंभरी देवी की उपासना करने वालो के घर शाक यानि कि भोजन से भरे रहते हैं।


शाक-सब्जी से किया पालन
शाकुंभरी देवी की अन्य कथा के अनुसार दैत्य दुर्गम ने ब्रहमा जी से यह वरदान प्राप्त किया कि मुझसे युद्ध में कोई जीत ना सके वरदान पाकर वो निरंकुश हो गया तो सब देवता देवी की शरण में गये और उन्होने प्रार्थना की । ऋषियो और देवो को इस तरह दुखी देखकर देवी ने अपने नेत्रो में जल भर लिया । उस जल से हजारो धाराऐं बहने लगी जिनसे सम्पूर्ण वृक्ष और वनस्पतियां हरी भरी हो गई । एक सौ नेत्रो द्धारा प्रजा की ओर दयापूर्ण दृष्टि से देखने के कारण देवी का नाम शताक्षी प्रसिद्ध हुआ । इसी प्रकार जब सारे संसार मे वर्षा नही हुई और अकाल पड गया तो उस समय शताक्षी देवी ने अपने शरीर से उत्पन्न शाको यानि साग सब्जी से संसार का पालन किया । इस कारण पृथ्वी पर शाकंभरी नाम से विख्यात हुई ।

माता देवी या ईश्वरी का नाम दुर्गा हुआ
देवी ने प्रसन्नतापूर्वक उस राक्षस से वेदों को त्राण दिलाकर देवताओं को सौंप दिया। वे बोलीं कि मेरे इस उत्तम महात्म्य का निरन्तर पाठ करना चाहिए। मैं उससे प्रसन्न होकर सदैव तुम्हारे समस्त संकट दूर करती रहूँगी। शाकम्बरी देवी ने सभी वेद और शक्तियां देवताओं को वापस कर दिया। तब माता देवी या ईश्वरी का नाम"दुर्गा" हुआ क्योंकि उन्होंने दानव दुर्गम को मारा था ।