
rani durgavati ki kahani hindi me
जबलपुर। सन 1857 में रानी लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों से लोहा लिया ये सभी को याद है। किंतु इसके पहले भी एक रानी और थी, जिसने अतिक्रमणकारी मुगलों से सीधी टक्कर ली और महान कहे जाने वाले अकबर को भी उसके सामने झुकना पड़ गया था। इसका नाम रानी दुर्गावती था। जिसकी शौर्य गाथा आज भी मप्र में गूंजती है।
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मुख्यमंत्री चौहान और 50 आदिवासी नेता होंगे शामिल
टीएफआरआइ मैदान में हितग्राही सम्मेलन
रानी के शौर्य, अदम्य साहस व मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की गाथा बलिदान स्थली में गूंजेगी। बारहा स्थित रानी दुर्गावती के समाधि स्थल पर आदिवासी कलाकार अपने अंदाज में श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। 24 जून को होने वाले वृहद आयोजन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह व महाकोशल के 50 आदिवासी नेता शामिल होंगे। वे भी साम्राज्ञी को श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण के केन्द्र होंगे।
टीएफआरआई के मैदान में वृहद स्तरीय हितग्राही सम्मेलन होगा। इसमें हितग्राहियों को वन अधिकार पट्टे जारी किए जाएंगे। असंगठित मजदूरों को शासकीय योजनाओं का लाभ दिया जाएगा। पीएम आवास, उज्ज्वला योजना योजना के हितग्राहियों को लाभांवित किया जाएगा। 30 हजार तेंदुपत्ता संग्राहक हैं उन्हें साड़ी, कुप्पी व अन्य सामग्री का वितरण होगा।
इसलिए शहरवासियों का सीधा जुड़ाव
रानी दुर्गावती के शासन में गोंडवाना राज्य ने उन्नति की। शिक्षा के बड़े केंद्र के रूप में राज्य को विकसित किया था। विवाह के चार साल बाद ही रानी के पति दलपत शाह की असमय मृत्यु हो गई। उन्होंने पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बिठाकर उसके संरक्षक के रूप में राज-पाट सम्भाला। मुगल शासक अकबर ने अपने रिश्तेदार आसफ खां के माध्यम से गोंडवाना राज्य पर आक्रमण कर दिया। रानी ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए मुगलों की सेना को शिकस्त दी। अगली बार मुगल सेना ने दोगुनी ताकत से हमला किया। साम्राज्ञी ने पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। युद्ध में तीन हजार मुगल सैनिक मारे गए। अगले दिन 24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर आक्रमण किया उस दिन युद्ध में लड़ते हुए वे वीर गति को प्राप्त हुईं।
Published on:
19 Jun 2018 01:38 pm
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