
republic day 2018 neta ji won congress election against mahatma gandhi
जबलपुर। 26 जनवरी 2018 को संविधान का निर्माण हुए 7 दशक पूरे होने का एक और कदम बढ़ जाएगा। संविधान और स्वधीनता भारत देश के लिए दो महत्वपूर्ण पर्व हैं। वैसे तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का जबलपुर संस्कारधानी से बहुत पुराना नाता रहा है। यहां देश के दिग्गज नेताओं का आना आम बात थी। लेकिन यहां के नेताओं ने भी दिल्ली तक अपनी छाप छोड़ी थी। उनकी स्मृतियां आज भी यहां मौजूद हैं, जो याद दिलाती हैं उन सुनहरे पलों की, उन वीर रस के भाषणों की जो आजादी के परवानों द्वारा दिए जाते रहे हैं। वहीं दूसरी ओर से स्मृतियां अपने अतीत को भुलाती नजर आ रही हैं। जिम्मेदारों की उपेक्षा का शिकार होकर ये सुनहरी यादें खंडहर में तब्दील हो रही हैं। आईये ऐसे ही एक वीर सपूत नेताजी सुभाषचंद बोस की यादों पर एक नजर डालते हैं...
नेताजी सुभाषचंद्र बोस चार बार जबलपुर आए थे। जबलपुर जेल में आज भी उनकी स्मृतियां शेष हैं। नेताजी का लोहा स्वयं गांधीजी ने माना था और ऐसी कई इतिहासप्रद स्मृतियां हैं जो नेताजी की स्मृति में आज भी यहां मौजूद हैं। 1945 के बाद भी नेताजी के जिंदा रहने के समाचार के बाद एक बार फिर उनकी देशभक्ति व विजयगाथाओं को याद किया जा रहा है।
मार्च 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में नेताजी का जबलपुर आगमन हुआ। उन्होंने पट्टाभि सीतारमैया जिन्हें गांधी जी सहित कई दिग्गज नेताओं का समर्थन प्राप्त था जबलपुर आए थे। बताया जाता है कि उस दौरान नेताजी 104 डिग्री बुखार में यहां आए थे। इसे इतिहास में स्वाधीनता आंदोलन का भूकंप के नाम से जाना जाता है।
उन दिनों तिलवाराघाट के पास सजावट हुई थी। 52 हाथियों का जुलूस निकाला गया। त्रिपुरी स्मारक अब भी उनकी याद दिलाता है। 20 मई 1932को वे बड़े शरतचंद्र के साथ जेल आए थे। यहां से उन्हें मद्रास से जाया गया। इसके बाद तीसरी बार 1933 में एक बार फिर जबलपुर जेल लाया गया था।
नेताजी अंतिम बार जुलाई 1939 राष्ट्रीय नवयुवक मंडल का उद्घाटन करने आए थे। अंग्रेजों के नजरबंद करने के बाद उन्होंने यूरोप कूच किया। फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना की और फिर आजाद हिंद फौज की, जो इतिहासप्रद और अविस्मरणीय है।
इनका कहना है
इतिहासकार राजकुमार गुप्ता के अनुसार देशभक्त स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की यादें इस शहर से जुड़ी हुई हैं वे चार बार जबलपुर आए थे। अब भी उनकी मौत पर रहस्य बना हुआ है।
यहां गरजे थे नेता जी -
नेताजी सुभाषचंद्र बोस के दिल में देश की आजादी के लिए कितनी तड़प थी.. तत्कालीन परिस्थितियों को लेकर कितना दर्द था..। 29 जनवरी 1939 को जबलपुर में त्रिपुरी अधिवेशन के दौरान दिया गया उनका भाषण इसकी बानगी है। उनके भाषण का हर शब्द अनमोल है। उल्लेखनीय है कि जबलपुर के तिलवाराघाट में हुए कांग्रेस के 52 वें अधिवेशन में नेताजी को पूरी बुलंदी के साथ अध्यक्ष चुना गया था। महात्मा गांधी की ओर से उम्मीदवार रहे, पट्टाभि सीतारमैया को 203 मतों से करारी हार मिली थी। यह बात अलग है कि तत्कालीन शीर्ष नेताओं के विरोध के चलते नेताजी ने चार महीने बाद ही यह पद त्याग दिया था।
अराजकता का माहौल
त्रिपुरी स्मारक में अराजकता का माहौल है। सुखी झाडिय़ां जहां खंडहर का रूप प्रदान कर रही हैं। वहीं शराबियों और नशेडिय़ों के कारण यहां आम जनों व परिवार वालों का आना लगभग बंद हो गया है। वहीं टूटती और जर्जर हो रहीं सीढिय़ां डरावना एहसास दिलाती हैं। क्षेत्रीय लोगों की मानें तो यहां दिन रात शराबियों और असमाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है। जिससे लोग यहां आने से छड़कते हैं। गांधी स्मारक में पूरे समय ताला जड़ा रहता है जिससे वहां कोई जा ही नहीं पाता।
Updated on:
07 Jan 2018 04:33 pm
Published on:
07 Jan 2018 04:07 pm
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