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संबोधि दिवस: विश्व में प्रसिद्ध है ये मौलश्री, इसी के नीचे ‘ओशो’ को मिला बुद्धत्व

21 मार्च, 1953 को एक विशेष वृक्ष मौलश्री के नीचे ओशो को संबोधि प्राप्त हुई। इस समय ओशो की उम्र महज 21 वर्ष थी

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Abha Sen

Mar 20, 2016

osho

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जबलपुर। संबोधि दिवस, ओशो के अनुयायियों के लिए खास दिन है। देश में ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध इस दिन का जबलपुर शहर से खास नाता है। क्योंकि जबलपुर ही वह स्थान है जहां ओशो को संबोधि प्राप्त हुई। आज भी वह वृक्ष यहां मौजूद है और ओशो के अनुयायी यहां बैठकर खुद को ओशो की छत्रछाया में महसूस करते हैं।

21 मार्च, 1953 को एक विशेष वृक्ष मौलश्री के नीचे ओशो को संबोधि प्राप्त हुई। इस समय ओशो की उम्र महज 21 वर्ष थी और व वे जबलपुर में दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी थे।

संबोधि शब्द बौद्ध धर्म का है। इसे बुद्धत्व (Enlightenment) भी कहा जा सकता है। देखा जाए तो यह मोक्ष या मुक्ति की शुरुआत है। फाइनल बाइएटिट्यूड या सेल्वेशन (final beatitude or salvation) तो शरीर छूटने के बाद ही मिलता है।

ओशो के अनुयायियों के लिए 21 मार्च का दिन बड़ा ही खास होता है। इस दिन को वह ओशो संबोधि दिवस के रूप में मनाते हैं। पूरे विश्व में स्थित ओशो धाम में इस दिन विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।


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जिस 'मौलश्री वृक्ष' के नीचे ओशो को संबोधि यानी ज्ञान की प्राप्ति हुई थी वह वृक्ष जबलपुर के भंवरलाल पार्क में स्थित है। आज यह वृक्ष भूरे रंग की पृथ्वी तथा घास के बीचों-बीच स्थित है, और एक गहरी संकरी खाई ने इसे चारों ओर से घेरा हुआ है मध्यप्रदेश, जबलपुर के भंवताल उद्यान में इसे धातु के बने गेट से पूरी तरह संरक्षित किया गया है। संबोधि दिवस पर समीप ही बनाए गए ओशो आश्रम में खास कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिसमें ओशो के विदेशी भक्त भी शामिल होते हैं।