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खर मास में इसलिए नहीं होती शादियां, हैरान कर देगा ये धार्मिक और वैज्ञानिक रहस्य

जाड़े के लिए प्रसिद्ध पूस का महीना शुरू, 16 दिसंबर को होगा खर मास का शुभारंभ
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जबलपुर

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Prem Shankar Tiwari

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Updated: 4 Dec 2017, 8:47 PM IST

significance of kharmas

16 दिसंबर को होगा खरमास का शुभारंभ

जबलपुर। कड़कड़ाती सर्दी के लिए प्रसिद्ध पूस का महीना सोमवार ४ दिसंबर से प्रारंभ हो गया है। सूर्यदेव के धनु राशि में प्रवेश के साथ 16 दिसंबर से खर मास भी प्रारंभ हो जाएगा। भारतीय पंचांग के अनुसार सूर्य जब-जब गुरु की राशि यानी धनु राशि में रहते हैं तब तक खर मास माना जाता है। इसमें मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। इस बार खरमास 14 जनवरी तक रहेगा। खरमास में मांगलिक कार्यों के संपन्न नहीं होने का एक वैज्ञानिक आधार भी है। आइए भारतीय मनीषियों द्वारा इस व्यवस्था में समाहित किए गए धार्मिक व वैज्ञानिक पहलुओं से आपको भी अवगत कराते हैं।

क्या है खरमास
वैदिक पंचांग गणना के अनुसार सूर्य एक राशि में एक महीने तक रहता है। जब सूर्य 12 राशियों का भ्रमण करते हुए बृहस्पति की राशियों यानी धनु या मीन, में प्रवेश करता है, तो इसे खरमास की संज्ञा दी जाती है। प्राय: यह महीना पूस और चैत्र में ही आता है। खरमास के दौरान इसकी ३० दिनों की अवधि में शादी विवाह जैसे मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। १६ दिसंबर २०१७ को दोपहर १२ बजकर ०४ मिनिट पर सूर्य देव गुरू की राशि मीन में प्रवेश कर जाएंगे। इसके साथ ही खरमास प्रारंभ हो जाएगा, जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश होने तक यानी १४ जनवरी २०१८ तक चलेगा। इस अवधि में यज्ञापवीत यानी जनेऊ संस्कार, मुंडन संस्कार, नव गृहप्रवेश, विवाह आदि नहीं किए जाते हैं।

गुरु की उपस्थिति जरूरी
ज्योतिषाचार्य पं. जनार्दन शुक्ला के अनुसार विवाह यानी पाणिग्रहण के लिए ग्रह मंडल में गुरु और शुक्र की उपस्थिति आवश्यक होती है। ये दोनों समृद्धि और सुख के कारक हैं। इस समय गुरू तुला राशि में हैं, लेकिन १३ दिसंबर को शुक्र ग्रह अस्तांचल में प्रवेश कर जाएगा। शुक्र के अस्त होते ही विवाह आदि मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा, जो २०१८ में शुक्रोदय के साथ फिर से प्रारंभ होंगे। लौकिक मान्यता के अनुसार खरमास में भले ही विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं होते, लेकिन इस महीने में धार्मिक अनुष्ठानों को अच्छा माना गया है। ज्योतिषाचार्य पं. अखिलेश त्रिपाठी का मानना है कि सूर्य और गुरु के मिलन पर अनुष्ठान और हवन आदि किए जाते हैं। इस अवधि में इनका लाभ और बढ़ जाता है। पौष महीने में सूर्योपासना का विशेष महत्व है।

ये है धार्मिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष
खरमास में या फिर गुरु ग्रह के अस्त होने पर मांगलिक कार्यों पर प्रतिबंत के पीछे धार्मिक पक्ष यह है कि जगत की आत्मा कहे जाने वाले सूर्य देव जब देव गुरु वृहस्पति के घर में आते हैं तो देव गुरू का समर्पण और ध्यान उन पर केन्द्रित हो जाता है। मांगलिक कार्यों में उनकी सूक्ष्म उपस्थिति या फिर इनके लिए होने वाले शुभ प्रभाव कम हो जाते हैं। सिहोरा के समीप ग्राम बरगवां निवासी पं. स्व. एचपी तिवारी ने अपनी पुस्तक में इसके मनोविज्ञान की तर्क संगत व्याख्या की है। पं. तिवारी ने लिखा है कि पूस के महीने में सर्दी अधिक पड़ती है। पुराने जमाने में टेंट हाउस या फिर इस तरह की अन्य व्यवस्थाएं नहीं थीं। ऐसे में यदि घर पर कोई मांगलिक कार्य आयोजित किया जाए तो मेहमानों को असुविधा होना स्वाभाविक है। इसी तरह चैत्र माह में भी खेती का काम अधिक रहता है। इसलिए उस खरमास में भी मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं, ताकि किसान खेती का कार्य सुविधाजनक तरीके से कर सकें।

... और ये वैज्ञानिक पक्ष
खगोलशास्त्री प्रो. आरएस शर्मा का मानना है कि सूर्य की तरह गुरु ग्रह भी हाइड्रोजन और हीलियम की उपस्थिति से बना है। सूर्य की तरह इसका केंद्र भी द्रव्य से भरा हुआ है, जिसमें अधिकतर हाइड्रोजन ही है, जबकि दूसरे ग्रहों का केन्द्र ठोस है। पृथ्वी से 15 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित सूर्य तथा 64 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित बृहस्पति ग्रह में वर्ष में एक बार ऐसे जमाव में आते हैं जिनकी वजह से सौर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के माध्यम से बृहस्पति के कण काफी मात्रा में पृथ्वी के वायुमंडल में पहुंचते हैं। ये कण एक-दूसरे की कक्षा में आकर अपनी किरणों को आंदोलित करते हैं। जानकारों का मानना है कि उक्त कारण से व्यक्ति की मानसिक स्थिति में भी परिवर्तन आता है जिससे मांगलिक कार्यों में व्यवधान संभावित है। इसी कारण से धनु व मीन राशि के सूर्य को खरमास/मलमास की संज्ञा देकर व सिंह राशि के बृहस्पति में सिंहस्थ दोष दर्शाकर भारतीय भूमंडल के विशेष क्षेत्र गंगा और गोदावरी के मध्य (धरती के कंठ प्रदेश से हृदय व नाभि को छूते हुए) गुह्य तक उत्तर भारत के उत्तरांचल, उत्तरप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, राज्यों में मंगल कर्म व यज्ञ करने का निषेध किया गया है, जबकि पूर्वी व दक्षिण प्रदेशों में इस तरह का दोष नहीं माना गया है।