' बेटा, डरो मत, तुम्हारा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ेगा, जज आंटी को बताओ, तुम कहां जा रहे हो ?' ' जी (लरजते स्वर मेें ) मेरे चाचा मुझे दमोह ले जा रहे हैं। ' वो कहां हैं, दमोह में तुम्हारा कोई रिश्तेदार रहता है क्या ? ' नहीं, मैडम जी, वहां होटल में काम करने के लिए जा रहा हूं। चाचा आप लोगों को देखकर कहीं चले गए। ' ' आप करना चाहते हो यह काम ?' 'नहीं मैडम जी, मैं पढऩा चाहता हंू ।' 'ठीक है तुम चिंता मत करो बेटे, हम तुम्हारे घर के लोगों को बुलवाते हैं। आओ, बिस्किट खाओ...।' यह संवाद है रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर-एक पर मौजूद विधिक सेवा प्राधिकरण की टीम के सदस्य, सीबीआई की विशेष न्यायाधीश माया विश्वलाल व 12 साल के उसे बालक के बीच के, जिसे बालश्रम की आग में झोंकने के लिए उसका सगा चाचा उसे ले जा रहा था। आननफानन में उससे पूछ कर उसके परिजनों को सूचना दी गई। बालक को उसकी दादी के सुपुर्द कर दिया गया।