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hindi divas special : हिंदी के लिए भरी हुंकार, नेहरू से भिड़ गए थे नगरसेठ

- राजभाषा आंदोलन के ध्वजवाहक और जबलपुर के प्रथम सांसद सेठ गोविंददास ने लौटाया था पद्मभूषण, संसद में सेठजी का ऐतिहासिक भाषण: विरोधियों पर तीखा प्रहार

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जबलपुर। जबलपुर हिन्दी चेतना का शुरू से वाहक बना रहा। चाहे वह हिन्दी को राजभाषा बनाने का आंदोलन हो या हिन्दी साहित्य साधना, शहर की प्रतिभाओं ने अग्रणी भूमिका निभाई है। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए अथक प्रयास करने वालों में जबलपुर के सांसद रहे साहित्यकार सेठ गोविंददास का नाम अग्रगण्य है। वे हिंदुस्तान व हिन्दी के सुरताल में अंग्रेजी भाषा के संगीत मिश्रण के धुर विरोधी थे। क्षेत्रीय भाषाओं को अलग-अलग राज्यों की शासकीय भाषा का अधिकार देने के प्रस्ताव पर हुई चर्चा के दौरान संसद में दिया गया सेठ गोविंददास का भाषण हिन्दी के विकास में मील का पत्थर माना जाता है। हिन्दी हित में उनके गर्जित स्वर आज भी हिन्दी प्रेमियों के लिए जीवंत व आदर्श हैं। ऐसे ही अनेक पहलुओं को समेटे हिन्दी दिवस पर पत्रिका की विशेष प्रस्तुति...

हिन्दी भाषा के विकास और राजभाषा आंदोलन में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार सेठ गोविंददास का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने न केवल साहित्य साधना की, बल्कि अपने राजनीति प्रभाव से हिन्दी को राजभाषा बनाने में ध्वजवाहक भी रहे। भारतेंदु हरीशचंद्र, बाबू पुरुषोत्तमदास टंडन के साथ सेठ गोविंददास ही ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दी के लिए समर्पित कर दिया था। सबसे पहले हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने का प्रयास आरंभ करने वालों में सेठ गोविंददास का नाम हमेशा सबसे पहले और आदर के साथ लिया जाता है।

संसद में सेठजी का ऐतिहासिक भाषण: विरोधियों पर तीखा प्रहार

'जिस भाषा ने स्वाधीनता संग्राम में पूरे देश को एकसूत्र में पिरो दिया, उसे कमजोर नहीं माना जा सकता। इसी बात से यह अनुमान लगा लेना चाहिए कि यह कितनी शक्तिशाली भाषा है। हिंदी की वर्णमाला की आधी भी नहीं है अंगे्रजी की वर्णमाला। हिंदी का उद्गम संस्कृत से हुआ है, भारत में प्रचलित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत ही है। एक मां से उत्पन्न बच्चों में अधिक सामंजस्य होगा या अलग-अलग माताओं की संतानों में? यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के एक तिहाई से अधिक लोगों की भाषा को अपने ही देश में राजभाषा का दर्जा पाने के लिए याचना करना पड़ रहा है।Ó

सौ साल पहले ही बना दिया नियम
सन् 1910 में काशी की नागरी प्रचारिणी सभा ही देश में हिन्दी की एकमात्र ध्वजवाहक संस्था थी। हिन्दी को देश की राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए उसी समय आंदोलन शुरू हुआ। 10 अक्टूबर 1910 को प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन नागरी प्रचारिणी सभा के परिसर में ही हुआ। इसकी प्रथम नियमावली में ही हिन्दी को देश की राजाभाषा व देवनागरी लिपि को राजकीय लिपि घोषित कर दिया गया। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय इस सम्मेलन के सभापति थे। सेठ गोविंददास ने सम्मेलन में सबसे पहले हिन्दी को नियमावली में शामिल करने का प्रस्ताव रखा। इसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया और हिन्दी को राष्ट्रभाषा व देवनागरी को राष्ट्रीय लिपि घोषित कर दिया गया। इस सम्मेलन में राजर्षि बाबू पुरुषोत्तमदास टंडन, रामधारी सिंह दिनकर, डॉ राजेंद्र प्रसाद जैसे विद्वान मौजूद थे।
प्रारूप में करा लिया था शामिल सेठ गोविंददास ने डा. भीमराव अंबेडकर को हिन्दी को राजभाषा बनाने के पक्ष में जोरदार तर्क दिए। उनके प्रभाव में संविधान के प्राथमिक ड्राफ़्ट में इस प्रस्ताव को सम्मिलित कर लिया गया। हालांकि बाद में क्षेत्रवाद के चलते संविधान सभा की बैठक में अंग्रेजी को देश की राजभाषा बना दिया गया।

संशोधन के विरुद्ध संसद मं इकलौता स्वर
1962 में सत्तासीन कांग्रेस ने संसद में एक विधेयक प्रस्तुत किया। इसमें अंग्रेजी को देश को जोडऩे वाली भाषा बताते हुए इसे राजकीय भाषा बनाने की बात कही गई। इस प्रस्ताव के अंतर्गत राज्यों को अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को भी दूसरी राजकीय भाषा बनाने का अधिकार दिया जाना था। कांग्रेस के पक्के समर्थक होने के बावजूद सेठ गोविंददास इस बात को पचा नहीं पाए। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से इस सम्बंध में चर्चा की, लेकिन नेहरू व गोविंददास में सहमति नहीं बन पाई। उन्होंने इसे जनतांत्रिक अधिकार निरूपित करते हुए नेहरू से अपना मत प्रकट करने की अनुमति मांगी। बताया जाता है कि दोनों के बीच इसे लेकर मनमुटाव भी हो गया था, लेकिन नेहरू को सेठ गोविंददास की जिद के आगे झुक कर उन्हें विरोध दर्ज कराने की अनुमति देनी पड़ गई। संसद में संविधान के अनुच्छेद 343 में प्रस्तावित इस संशोधन के खिलाफ मत देने वाले वे इकलौते सांसद थे।