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संस्कारधानी की होली में नजर आती है पूरे देश की संस्कृति

हर चौराहे पर लगे हुए चोंगे (लाउड स्पीकर), चोंगों पर बजने वाले होली के फड़कते गीत और उन गीतों पर थिरकते, नाचते युवा, उन युवाओं के आजू बाजू मे, खुशी से गुजरते और ‘होली है…..’ चिल्लाते हुए कार-बाइक से जाते हुए लोग। संस्कारधानी में देश के हर क्षेत्र के लोग निवास करते हैं। इसलिए होली पर भी शहर में कुछ ऐसे ही अलग अंदाज देखने को मिलते हैं। रीति-रिवाज थोड़े भिन्न हैं। लेकिन लाल-पीले, हरे-नीले रंगों व गुलाल की खूबसूरती के बीच होली पर सभी एकता के रंग में सराबोर नजर आते हैं।

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jabalpur holi

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विभिन्न क्षेत्रों के निवासरत लोग अलग-अलग तरीक़े से मनाते हैं होली, 5 दिनों तक सिर चढ़कर बोलता है शहर की बुन्देलखण्डी होली का सुरुर, इस वर्ष नजर आ रहा जबरदस्त उत्साह

जबलपुर।
हर चौराहे पर लगे हुए चोंगे (लाउड स्पीकर), चोंगों पर बजने वाले होली के फड़कते गीत और उन गीतों पर थिरकते, नाचते युवा, उन युवाओं के आजू बाजू मे, खुशी से गुजरते और ‘होली है…..’ चिल्लाते हुए कार-बाइक से जाते हुए लोग। संस्कारधानी में देश के हर क्षेत्र के लोग निवास करते हैं। इसलिए होली पर भी शहर में कुछ ऐसे ही अलग अंदाज देखने को मिलते हैं। रीति-रिवाज थोड़े भिन्न हैं। लेकिन लाल-पीले, हरे-नीले रंगों व गुलाल की खूबसूरती के बीच होली पर सभी एकता के रंग में सराबोर नजर आते हैं। यहां पंजाबी लोग धूमधाम से होला मोहल्ला मनाते हैं तो बंगभाषियो की होली का अपना अलग अंदाज है। शहर में बुन्देलखण्डी होली का सुरुर 5 दिनों तक सिर चढ़कर बोलता है। वहीं दक्षिण भारतीय और मराठी संस्कृति की होली के रंग भी खूब बिखरते हैं। दो वर्ष कोरोना महामारी के चलते व बीते वर्ष सहमे-सहमे होली खेलने के बाद इस वर्ष रंगोत्सव के लिए शहर में जबरदस्त उत्साह नजर आ रहा है। सभी वर्गों के लोग पर्व मनाने के लिए जमकर तैयारियों में जुटे हैं।


बेदीनगर में 5 दिन लगेगा मेला-

शहर में गुजराती भी रहते हैं तो मराठी भी। पंजाबी, राजस्थानी, साउथ इंडियन सभी समाज के लोग साथ में रहने से सारी परंपराएं व रीति-रिवाज एकाकार हो गए हैं। नितिन भाटिया बताते हैं कि पंजाबी समाज में खास तौर पर होली का ऐसा कोई रिवाज नहीं है। सिख लोग होला मोहल्ला मनाते हैं, गुरुद्वारे जाते हैं और लंगर वितरित करते हैं। लेकिन मोना पंजाबी में ऐसी कोई परंपरा नहीं है। पर अब सभी के घर पर गुझिया व अन्य पकवान बनते हैं। एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं दी जाती हैं। ग्वारीघाट गुरुद्वारे में होला मोहल्ला पर आयोजन किया जाता है। वहीं बेदीनगर गुरुद्वारे में बेदी सम्प्रदाय के लोग दूर-दूर से आकर 5 दिनों तक होला मोहल्ला मनाते हैं। इस दौरान यहां मेला सा लगता है।


अरंडी की डाल के नीचे दहन-

शहर के गली-मोहल्लों, कॉलोनियों में होलाष्टक की शुरुआत के साथ ही जगह-जगह अरंडी को पेड़ की डाल के रूप में होली के खम्ब गड़ा जा रहे हैं। स्थानीय परंपरा है कि अरंडी के पेड़ के नीचे होलिका और प्रहृलाद की प्रतिमा रखकर होलिका दहन होता है।


बंग भाषी खेलेंगे दोले-

बंगाली समाज में होली खेलने को दोले खेलना कहते हैं। होली जलाने की परंपरा तो है लेकिन उसे होलिका दहन न कहकर नाड़ापोड़ा कहा जाता है। सौमित्र मुखर्जी ने बताया कि होली पर होलिका न जलाकर धान की फसल कटने के बाद जो कचरा होता है उसे जलाया जाता है। इसके साथ आसपास का दूसरा कचरा भी जला देते हैं। एक तरह से इसके द्वारा स्वच्छता का संदेश दिया जाता है।

मराठी समाज मे बनेगी पूरन पोड़ी-

मराठी समाज में होली पर पूरन पोड़ी विशेषकर बनती है। अरुण सातपुते ने बताया कि हमारे समाज में कहते भी हैं कि होली रे होल, पूरन की पोली। इसके साथ ही सामान्य पूजन होता है। इसी तरह मारवाड़ी समाज में होली के दिन दलिया और गुड़ की लपसी के साथ दाल-बाटी और चूरमा बनाया जाता है।

दुख दर्द में होते हैं शामिल-

होली का पर्व एक दूसरे के दुख परेशानी में शामिल होने का संदेश देता है। शहर में एक परम्परा उल्लेखनीय है कि आसपास जिसके भी घर में किसी की मृत्यु हुई होती है, लोग उसके यहां मिलने जरुर जाते हैं। ऐसा करके सामाजिक एकता का संदेश दिया जाता है। जिसके घर में इस तरह की परेशानी है वहां जाकर बताया जाता है कि उनके दुख के सभी शामिल हैं वो लोग अकेले नई हैं। गुलाल का टीका करके दुखी परिवार वालों को जीवन मे आगे बढ़ने की ओर प्रेरित किया जाता है।

लकड़ियां, कंडे नहीं मांगते, पर जुनून बढ़ा-

नेपियर टाउन निवासी 75 वर्षीय रूपसिंह ठाकुर बताते हैं कि पुराने दिनों में एक मैदान में चूने का घेरा बनाकर होलिका रखी जाती थी। होली के लिए बच्चे घर-घर जाकर लकड़ियां और कंडे मांगते थे और लोग खुशी खुशी देते थे। हर किसी को अगले दिन धुरेड़ी पर रंग-गुलाल खेलने का जुनून होता था। खूबचन्द कोरी कहते हैं कि अब होली पर लकड़ी कंडे नही मांगे जाते, लेकिन होली खेलने का जुनून और बढ़ गया है।


प्राकृतिक रंगों का प्रयोग हुआ कम-

बुजुर्गों का कहना है कि रंग बनाने के लिए कई दिन पहले आम की नई कोपलों और हरी पत्तियों को कुंडों में भरकर रखा जाता था ताकि उनका रंग पानी में घुल जाए। बाद में पत्तियों को पानी में उबाला जाता था, जिससे गाढ़ा हरा रंग बनता था। टेसू के अलावा अन्य रंग बिरंगे फूलों से प्राकृतिक रंगों को तैयार किया जाता था। प्राकृतिक रंग तो अब कम देखने को मिलते हैं पर शहर में गेरू, पीली मिट्टी से होली का चलन बढ़ गया है।


रसरंग बारात के रंग अलग-

गुंजन कला सदन संस्था द्वारा सबसे पहले रसरंग बारात का आयोजन वर्ष 1990-91 में किया गया। इसमें शहर के सभी वर्गों से राजनेताओं, समाजसेवी, व्यापारियों, कवियों, कलाकारों, पत्रकारों, साहित्यकारों के साथ-साथ अन्य सभी को भी शामिल किया गया। रसरंग बरात को घोड़े, दुलदुल घोड़ी के साथ-साथ गधों पर भी निकाला गया। बाराती बैलगाडि़यों में गुलाल भर कर रास्ते भर गुलाल उड़ाते हुए निकलते थे। रसरंग बारात ने शहर पर होली के माहौल को बेहतर करने में बड़ी भूमिका निभाई। बाद में भीड़ को देखते हुए रसरंग बारात को रसरंग महोत्सव में बदल दिया गया।

5 दिन चलती है बुंदेली होली-
बुंदेलखंड क्षेत्र के लोग संस्कारधानी में बहुतायत में हैं। इसके चलते यहां बुंदेलखंड की होली के रंग भी नजर आते हैं।बुंदेलखंडी परम्परा के तहत लोग 5 दिनों तक अलग अलग तरह से होली खेलते हैं। फागों की सुमधुर धुनों के बीच रंगों के साथ धूल, कीचड़ व गोबर की होली भी खेली जाती है। बुंदेली होली में रंगपंचमी का सर्वाधिक महत्व है। रंगपंचमी पर जमकर रंग-गुलाल उड़ता है।