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बंबुलियां लोकगीतों में समाई नर्मदा जी की गाथा

पुण्यसलिला रेवा की सदानीरा जलधारा संस्कारधानी और आसपास के अंचल की जीवनरेखा है। नर्मदा माता यहां की संस्कृति मे इस कदर गहरे तक समाई हैं कि नर्मदा जी की महिमा और उनसे जुड़ी कथाएं अंचल के बंबुलियां लोकगीतों में ढल गई हैं। बम्बुलियां, राई, ददरिया व अन्य क्षेत्रीय लोकसंगीत में नर्मदा के जन्म से लेकर उल्टा बहने तक की कथाएं सुंदर व मनमोहक धुनों के साथ गाई जाती हैं।

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bambuliuyan narmada ji

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मन मोह लेती हैं मधुर धुन
राई, ददरिया व अन्य क्षेत्रीय लोक गीतों में भी स्वरूप, महिमा और इतिहास का वर्णन
जबलपुर।
पुण्यसलिला रेवा की सदानीरा जलधारा संस्कारधानी और आसपास के अंचल की जीवनरेखा है। नर्मदा माता यहां की संस्कृति मे इस कदर गहरे तक समाई हैं कि नर्मदा जी की महिमा और उनसे जुड़ी कथाएं अंचल के बंबुलियां लोकगीतों में ढल गई हैं। बम्बुलियां, राई, ददरिया व अन्य क्षेत्रीय लोकसंगीत में नर्मदा के जन्म से लेकर उल्टा बहने तक की कथाएं सुंदर व मनमोहक धुनों के साथ गाई जाती हैं। नर्मदा जी के प्रकटोत्सव के पहले ये लोकगीत पूरे अंचल में भक्ति का रस घोलने लगे हैं।

बंबुलिया या लमटेरा में सिर्फ नर्मदा-

बंबुलिया गीत नर्मदांचल में गाँव-गाँव में गाए जाते हैं। नर्मदा को मा मानते हुए मायके से ससुराल आती-जाती बेटियाँ नर्मदा में ही स्वजनों का बिंब देखती-गाती हैं: ‘नरबदा मैया ऐंसीं तो मिलीं रे...., ऐंसीं तो मिलीं रे जैसे मिल गए मताई औ बाप रे.. नरबदा मैया हो..’। इस लोक गीत को लय सहित यूट्यूब पर भी सुना जा सकता है। 'नरबदा मैया दुधन बहें रे....', दरस की तो बेरा भई रे...' , ' तुमखे भजे रे नर नारी करत स्नान रे' जैसी बंबुलियां सुनकर श्रोता खो जाते हैं। बंबुलियां में बार-बार लम्बे आलाप या टेर होते हैं। इसलिए इसे लमटेरा (लम्बी टेरवाला) भी कहा जाता है।

रात से हो जाती है भोर-
लोकगीत गायक मनीष अग्रवाल मोनी कहते हैं कि अंचल के किसान खेतों में मचान पर बैठे-बैठे पशु-पक्षिओं से फसलों की रक्षा करते हुए भी बंबुलिया गाते हैं । प्राय: अकेलेपन को दूर करते हुए बंबुलिया गाई जाती है और उसे सुनकर कहीं दूर खेत ताक रहा कोई दूसरा सर्वथा अपरिचित गायक या गायिका स्वर में स्वर मिलाते हुए अपनी पंक्तियाँ गा उठता है। बहुधा कोई पूर्व निर्धारित विषय या पाठ न होने पर भी बंबुलिया गायन में साँझ से रात या रात से भोर कब हो जाती है पता ही नहीं चलता। ऐसे सरस बंबुलिया गायन से ग्राम्यांचलों में बसे अनजान आशु कवियों की प्रतिभा भी परवान चढ़ती है।
पौराणिक कथाएं और आधुनिक रूप-
बंबुलिया व अन्य लोकगीतों में नर्मदा के अवतरण का इतिहास भी बड़े सुंदर तरीके से गाया जाता है। मेकल चोटी पे उतरी है रेवा रे .. उतरी है रेवा रे! चिर कुँआरी ... पानी हे छूबे कौन रे! नरबदे मेरी हो।‘ वहीं बंबुलिया नर्मदा की धार से बन रही बिजलीऔर सिंचाई करने की बानगी भी पेश प्रस्तुत करती हैं।'नरमदे मैया हिरनी सी दौडीं ... हिरनी सी दौडीं, परवत पे ..बन्धा ने थामो वेग रे! नरमदे जय हो' ...और 'बरगी बँधा में बन रई बिजुरिया ... बन रई बिजुरिया, नरमदे.. खेतों में पोंहची है धार रे' जैसे लोकगीत नर्मदा की अंचल पर अतुलनीय कृपावृष्टि को प्रदर्शित करते हैं।

कर्मा, ददरिया व राई में भी रेवा के गुणगान-
अंचल में कर्मा, ददरिया व राई लोकगीत भी बहुत प्रचलित हैं। इन लोकगीतों में स्थानीय जनजीवन की झलक रहती है। नर्मदा माता के प्रति अंचलवासियों की अगाध आस्था इन लोकगीतों में भी साफ नजर आती है। जब मस्त होकर अंचल के नौजवान राई गाते हैं, 'तर जेहो नरबदा नहाबे से...' तो सुनने वालों के कदम मचलने लगते हैं। वहीं ददरिया की तान 'मैया नरबदा में जो भी नहाए, सीधे मुक्ति पाए...' भक्तिभाव से भर देती है। लोकगीत गायक प्रभुदयाल नाग कहते हैं कि महाकोशल अंचल के लोकगीतों में नर्मदा जी का अकल्पनीय स्थान है। जब लोकगीत गायक 'हमखों नरबदा दिखा दईयो रे, भोलेशंकर की मोड़ी' ...गाते हैं तो लोग भावविभोर हो जाते हैं।