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महिला सशक्तिकरण के नाम पर खानापूर्ति ठीक नही, मिले काम करने की पूरी आजादी – देखें वीडियो

महिला सशक्तिकरण के नाम पर खानापूर्ति ठीक नही, मिले काम करने की पूरी आजादी - देखें वीडियो  

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women empowerment

women empowerment

जबलपुर. महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा देने की बात लगातार की जा रही है। लेकिन, आज भी राजनीति सहित अन्य क्षेत्रों में उन्हें समान अवसर नहीं मिल पाते हैं। महिलाओं को सशक्त बनाने की जब बात हो तो केवल खानापूर्ति नहीं हो। जनप्रतिनिधि का मामला हो या समाज सेवा के क्षेत्र में काम करने का, महिला केवल मुखौटा बनकर आगे रहती हैं पीछे से पुरुष वर्ग ही उन्हें संचालित कर रहा है। यह बात राजस्थान पत्रिका की स्थापना दिवस सप्ताह है के मौके पर धनवंतरी नगर में आयोजित परिचर्चा में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी महिलाओं ने कही। उन्होंने नारी सशक्तिकरण सहित कई विषयों पर खुलकर अपनी बात रखी।

पत्रिका समूह के स्थापना सप्ताह पर आयोजित परिचर्चा में महिलाओं ने कहा
महिलाओं को राजनीति में मिले बराबरी तो नीति निर्माण में देंगी बेहतर योगदान

राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं को बराबर की हिस्सेदारी देने की बात कही जा रही है। कुछ हद तक इसमें काम भी हुआ है, राजनीतिक पार्टियों ने उन्हें अवसर भी दिए। लेकिन यह अवसर उन्हें ही मिले जिनके परिवार से कोई सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं। ऐसे में महिला सशक्तिकरण का क्या फायदा जब वह अपना निर्णय भी नहीं ले सकती। इस पर समाज को गंभीर विचार करने की आवश्यकता है।

श्यामा सिंह, समाजसेवी

नारी के प्रति सहयोगात्मक रवैया जरूरी है। चाहे राजनीति का क्षेत्र हो, परिवार का हो फिर कामकाजी महिला का। हर क्षेत्र में उसे अकेला नहीं छोडऩा चाहिए। एक कामकाजी महिला घर का काम भी करती है, परिवार भी जिम्मेदारी के साथ संभालती है तभी उसे जॉब करने दिया जाता है। जबकि पुरुषों के साथ ऐसा नहीं है। वह यदि बाहर जॉब करते हैं तो घर की जिम्मेदारी नहीं लेते।

रानू शर्मा, समाजसेवी

नारी का प्रतिनिधित्व तो समाज को मिल रहा है किंतु एक दो मामलों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर मामलों में महिला प्रतिनिधित्व केवल औपचारिकता है। वह समाज सेवा के क्षेत्र में भी निकलती है तो उन्हें इतनी हिदायतें दी जाती हैं जैसे वह कुछ गलत करने जा रही है। इस बात को गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।

कुमुद शर्मा, शिक्षिका

महिला सशक्तिकरण को लेकर शहर में बहुत से संगठन कम कर रहे हैं। महिला सशक्तिकरण को लेकर कार्यक्रम हुए लेकिन जो धरातल पर काम कर रही हैं उन महिलाओं को हाशिए पर रखा जाता है। शहर में सैकड़ंों महिलाएं है जो समाज उत्थान, पिछड़ी बस्तियों के बच्चों के लिए निरंतर काम कर रही हैं किंतु उनकी पहचान अब तक नहीं बन पाई है।

प्रभा रजक

परिवार में महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए अब जागरूकता तो आ रही है। किंतु अधिकतर परिवारों में उन्हें बाहर काम करने समाज सेवा या राजनीति में जाने की अनुमति नहीं है। हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हर महिला या युवती शॉर्टकट नहीं अपनाती। वह अपने दम पर पहचान बनाने की क्षमता भी रखती है।

मंजू तिवारी