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वर्षों पुरानी मांग, फिर भी सरकारी अस्पताल में नहीं खुला आइवीएफ सेंटर

जबलपुर के दो अस्पतालाें में शुरू करने का प्रस्ताव कागजों में, नि:संतान दम्पती हताश    

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यह है िस्थति
-7 आइवीएफ सेंटर शहर में
-1.50 से 5 लाख रुपए आईवीएफ पर निजी अस्पताल में खर्च
-80 हजार रुपए सरकारी अस्पताल में खर्च

जबलपुर। नि:संतान दंपती को बेटा-बेटी की चाह में लाखों रुपए इलाज पर खर्च करने पड़ रहे हैं। शहर के सरकारी अस्पताल में आइवीएफ सेंटर स्थापित करने का प्रस्ताव फाइलों में अटका हुआ है। निजी अस्पतालों के आइवीएफ सेंटर में आर्थिक रूप से कमजोर दंपती के लिए इलाज का खर्च उठाना आसान नहीं होता है। विशेषज्ञों के अनुसार शहर में नि:संतानता से पीडि़त परिवारों में से दस प्रतिशत दंपती में आइवीएफ की आवश्यकता पड़ती है। इसे देखते हुए मेडिकल अस्पताल और रानी दुर्गावती महिला अस्पताल में आइवीएफ सेंटर शुरू करने का प्रस्ताव तैयार किया गया था। लेकिन ये प्रस्ताव भोपाल स्तर पर रुका हुआ है। स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य विभाग ने प्रयास किए तो आउटसोर्स के लिए कोई सेंटर आगे नहीं आया है।

जबलपुर समेत प्रदेश के छह मेडिकल कॉलेज में आइवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) सेंटर शुरू करने का निर्णय लिया गया था। इन केंद्रों के खुलने से लोगों को बड़ी राहत मिलती। प्राइवेट अस्पतालों में नि:संतानता के इलाज का खर्च डेढ़ से साढ़े पांच लाख रुपए तक होता है। सरकारी में यह 80 हजार रुपए खर्च आता है। फ्री इलाज को लेकर स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. गौरी राय ने 6 साल पहले हाईकोर्ट याचिका दायर की थी। उसके बाद हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर प्रदेश सरकार को उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।

ऐसे समझें आइवीएफ
आइवीएफ एक फर्टिलिटी उपचार है। इसको वो लोग करवाते हैं, जो संतान उत्पन करने में असमर्थ होते हैं। यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए सहायक है, जिनको कोई जेनरिक दिक़्क़त या परेशानी है। विशेषज्ञों के अनुसार (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) में महिला आर्टिफिशियल तरीके से गर्भधारण करती है। इस प्रोसेस से जन्म लेने वाले बच्चे को टेस्ट ट्यूब बेबी कहा जाता है। आइवीएफ ट्रीटमेंट में महिला के एग्स और पुरुष के स्पर्म को मिलाया जाता है। जब इससे भ्रूण बन जाता है तब उसे वापस महिला के गर्भाशय में स्थापित कर दिया जाता है।


मेडिकल अस्पताल में तीन चरण में आइवीएफ सेंटर शुरू करने का प्रस्ताव बनाया था। यहां स्त्री रोग विभाग के मेडिकल छात्रों को आइवीएफ की बेसिक ट्रेनिंग दी जाती है।लेकिन कोरोना महामारी आने के बाद प्रस्ताव अटक गया। इस दिशा में ज्यादा काम नहीं हो सका है।
डॉ. कविता एन सिंह, विभागाध्यक्ष, स्त्री रोग विभाग

डेढ़ साल पहले एल्गिन अस्पताल में आइवीएफ सेंटर शुरू करने का प्रस्ताव शासन को भेजा था। स्थानीय स्तर पर आउटसोर्स पर ये सुविधा शुरू करने की दिशा में प्रयास किए गए, लेकिन कोई भी प्राइवेट सेंटर इसके लिए आगे नहीं आया।
डॉ. संजय मिश्रा, सीएमएचओ