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बीते दस वर्षों में बढ़ा चलन, होली खेलने में बोरियां पड़ जाती हैं कम
जबलपुर।
उत्सवधर्मी संस्कारधानी में सारा दिन व जमकर होली खेलने के जुनून ने यहां के युवाओं की होली का तरीका बदल गया है। बीते करीब दस वर्षों से यहां के युवा व बच्चे रंग की जगह जमकर पीली मिटटी और गेरू की होली खेलने लगे हैं।पीली मिट्टी औऱ गेरू की यह होली अनोखे अंदाज में होती है। रंगों में रंगे चेहरों की बजाय होली पर नौजवान पीली मिट्टी और गेरू से सने नजर आते हैं। पीली मिट्टी व गेरू से होली खेलने का प्रचलन इतना अधिक है कि बोरियां कम पड़ जाती है। हालांकि विशेषज्ञ इसे हानिकारक मानते हैं, लेकिन हर साल होली पर पीली मिट्टी और गेरू की खपत बढ़ती जा रही है।
पीली मिट्टी अधिक चलन में-
होली त्योहार पर गेरू पाउडर और पीली मिट्टी भी चलन में आ गई है। गेरू चार सौ रुपए प्रति बोरी और पीली मिट्टी भी सौ रुपए बोरी मिल रही है। पीली मिट्टी खदानों से निकाली जा रही है। वहीं, गेरू भी पाउडर करके बाजार में लाया जाता है। दुकानदारों के मुताबिक गेरू का चलन पीली मिट्टी की अपेक्षा कम है। पीली मिट्टी में छोटे पत्थर के कण भी शामिल रहते हैं। दुकानदार विजय नेमा ने बताया इस वर्ष गेरू की काफी डिमांड हैं। पिछले दो साल कोाविड के चलते लोग त्यौहार नहीं मना पाए थे। बीते वर्ष उन्होंने डेढ़ हजार पीली मिट्टी की बोरियां बेची थीं । अधिक बिक्री के कारण पीली मिट्टी का स्टॉक तक कम पड़ गया था ।
कम खर्च होता है-
शहर के युवाओं का मानना है कि पीली मिट्टी व गेरू से होली खेलना रंग-गुलाल की तुलना में काफी सस्ता पड़ता है। कम बजट में भी जमकर होली खेली जा सकती है। रंग महंगे होने की वजह से जल्दी खत्म हो जाते हैं। जबकि पीली मिट्टी व गेरू सस्ते व बोरियों में आते हैं,इसलिए दिन भर इनसे होली खेली जा सकती है। मेडिकल विद्यार्थी सहज पांडे कहते हैं कि वे बीते 4-5 साल से अपने मित्रों के साथ होली के दिन भर पीली मिट्टी व गेरू खेलते हैं। यह सस्ता तो है ही, छुटाने में भी आसान होता है।
दिन भर मस्ती, केमिकल से बचाव भी-
युवाओं का कहना है कि रंग की होली खेलने पर एक बार लगाया गया रंग जल्दी नहीं उतरता। ऐसे में उस रंग पर दूसरा रंग नही चढ़ता। इस वजह से एक बार रंगने के बाद हुरियारों को दोबारा रंग डालने में आनन्द नही आता। जबकि पीली मिट्टी व गेरू आसानी से साफ हो जाते हैं। चेहरे पर नजर नही आते। ऐसे में बार-बार पीली मिट्टी व गेरू से होली खेली जा सकती है। विधि के छात्र श्रवण साहनी कहते हैं कि पीली मिट्टी व गेरू रासायनिक रंगों की अपेक्षा सुरक्षित हैं। इनसे नुकसान नही होता। यह भी युवा वर्ग के इनके प्रति रुझान की बड़ी वजह है।
करते हैं स्टॉक-
शहर में होली का सुरूर 5 दिनों तक रहता है।विशेषतः युवा वर्ग रंगपंचमी तक होली खेलता है। धुरेड़ी व दूज को अधिकतर बाजार बन्द रहते हैं। ऐसे में नौजवान पहले से पांच दिनों की व्यवस्था कर गेरू व पीली मिट्टी खरीदकर स्टॉक कर लेते हैं। पांच दिनों तक जमकर पीली मित्तिव गेरू की होली का दौर चलता है। फल विक्रेता युवा संजू कश्यप कहते हैं कि उन्होंने अभी से पीली मिट्टी की दस बोरियां खरीदकर रख ली हैं।
रासायनिक रंगों से कम नुकसानदेह-
नौजवानों का कहना है कि रासायनिक रंगों की तुलना में पीली मिट्टी व गेरू की होली कम नुकसानदेह है। चिकित्सकों की भी कुछ ऐसी ही राय है। लेकिन पीली मिट्टी व गेरू के कणों से आंखों को खासी हानि होती है। जबलपुर सीएमएचओ डॉ संजय मिश्रा कहते हैं कि गेरू व पीली मिट्टी में छोटे छोटे कण होते हैं। ये आंख में जाकर कॉर्निया को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इन्हें त्वचा पर जमकर घिसने की वजह से त्वचा से सम्बंधित एलर्जी व अन्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। पीली मिट्टी व गेरू से बाल झड़ने की शिकायतें भी सामने आई हैं। डॉ मिश्रा कहते हैं कि रंग या पीली मिट्टी-गेरू की जगह हर्बल रंग-गुलाल का उपयोग किया जाना चाहिए।
Published on:
02 Mar 2023 12:05 pm
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