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परम्परागत खेलों की ओर मुड़ रहा युवा,भा रहा लाठी चलाना, गिल्ली-डंडा व गुलेल

क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस जैसे आधुनिक खेलों की लोकप्रियता के बीच संस्कारधानी का युवा वर्ग लाठी चलाना, गिल्ली-डंडा व गुलेल जैसे भारत के प्राचीनतम खेलों की ओर मुड़ रहा है। बीते कुछ वर्षों में इन परम्परागत खेलों के प्रति युवाओं की रुचि बढ़ी है। शहर के कुछ प्रशिक्षक बच्चों को इन पारंपरिक खेलों का पूरे मनोयोग से प्रशिक्षण दे रहे हैं।

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बीते कुछ वर्षों मे बढ़ा रुझान,बड़ी संख्या में लड़कियां सीख रहीं लाठी चलाना, गुलेल, गिल्ली डंडा से हो रहा सर्वांगीण विकास

जबलपुर। क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस जैसे आधुनिक खेलों की लोकप्रियता के बीच संस्कारधानी का युवा वर्ग लाठी चलाना, गिल्ली-डंडा व गुलेल जैसे भारत के प्राचीनतम खेलों की ओर मुड़ रहा है। बीते कुछ वर्षों में इन परम्परागत खेलों के प्रति युवाओं की रुचि बढ़ी है। शहर के कुछ प्रशिक्षक बच्चों को इन पारंपरिक खेलों का पूरे मनोयोग से प्रशिक्षण दे रहे हैं। निजी स्कूलों में भी बच्चों को इनका प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे बच्चों का आत्मरक्षा की कला के ज्ञान के साथ ही सर्वांगीण विकास भी हो रहा है।


नौजवान पीढ़ी में उत्साह-
लाठीबाजी के प्रति नौजवान पीढ़ी में खासा उत्साह नजर आ रहा है। लाठी खेल को देश मे राष्ट्रीय खेल के तौर पर मान्यता मिली हुई है। इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शामिल करने के लिए दावेदारी पेश की गई है। दो साल से इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खेला जा रहा है। एक वर्ष और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लाठी खेले जाने के बाद इसे ओलंपिक समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में स्थान मिल सकता है। प्रशिक्षक अमर कदम बताते हैं कि शहर में इस खेल के प्रति लड़कियों मे खास क्रेज है। यही वजह है कि बडी संख्या में किशोरियां और युवतियां बीते कई महीनों से लाठीबाजी की ट्रेनिंग ले रही हैं। बड़ी संख्या में नवयुवक भी इस खेल का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

एक हाथ से लाठी भांज रहीं लड़कियां-
हाथों में लाठी, मुठ्ठी बंधी हुई और आंखों में तेज...ये नजारा इस समय शहर के कई निजी स्कूलों मे दिखाई दे रहा है। जहां लड़कियों को लाठी भांजना सिखाया जा रहा है। लड़कियां अपने हाथों में लाठी को ऐसे घुमा रही हैं जैसे वाकई यह बच्चों का खेल हो। एक हाथ से लाठी को फर्राटे से घुमाना, दोनों हाथों से लाठी पकड़कर उसे चारों दिशा में घुमाना और आमने-सामने खड़े होकर युद्ध करना, ये सब लड़कियां आराम से कर रही हैं।छात्रा सिफत सानिया कहती हैं कि जब वे घर से निकलती हैं और रास्ते में उन्हे किसी लफंगे ने रास्ते में रोका तो ऐसे में वे सामान्य लकड़ी के माध्यम से भी उसका सामना कर सकती है। इससे उनका हौसला भी बढ़ता है और सुरक्षा भी होती है।

बड़ी संख्या में सीख रहे बच्चे व युवा -
प्रशिक्षक रामकिशोर सोनी का कहना है कि ये परम्परागत खेल पूर्वजों का उपहार हैं। इनसे बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है। गुलेल कम खर्च में निशानेबाजी सीखने और आत्मरक्षा का बेहतरीन जरिया है। इससे एकाग्रता बढ़ती है। गिल्ली डंडा से टीम भावना व ध्यान केंद्रित करने के साथ शारीरिक विकास में भी मदद मिलती है। इसी तरह लाठी भी आत्मरक्षा के साथ अच्छा व्यायाम है। सोनी बताते हैं कि बीते 2-3 वर्षों में सैकड़ों बच्चों व युवाओं को इन परम्परागत खेलों का प्रशिक्षण दे चुके हैं। अब भी बड़ी संख्या में बच्चे व युवा उनसे प्रशिक्षण ले रहे हैं।

गुलेल व गिल्ली डंडा भी लोकप्रिय-
परम्परागत खेलों में गुलेल व गिल्ली डंडा भी शहर के बच्चों व नौजवानों को भा रहा है। प्रशिक्षक सुभाष माझी कहते हैं कि गुलेल एकाग्रता बढ़ाने के लिए बेहतरीन खेल है। शूटिंग व तीरंदाजी जैसे अंतरराष्ट्रीय खेलों को सीखने के लिए काफी खर्च लगता है। लेकिन गुलेल के जरिए कम खर्च में निशानेबाजी सीखकर शूटिंग व तीरंदाजी में जल्द प्रवीण हुआ जा सकता है। उन्होंने बताया कि लड़कियों में गुलेल सीखने की लालसा अधिक है। वहीं गिल्ली डंडा के प्रति लड़को में आकर्षण है।वे बताते हैं कि बीते 2 वर्षों में ही सैकड़ों बच्चों को इन खेलों का प्रशिक्षण दे चुके हैं। निजी स्कूलों में भी इन खेलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

जीवन के हर क्षेत्र में मदद-
गुलेल चलाना सीख रहीं छात्राअर्पिता गोस्वामी, आराध्या तिवारी, धैर्य द्विवेदी का कहना है कि इस खेल से उनकी एकाग्रता बढ़ी है। शारीरिक विकास के साथ ही अब पढ़ाई में भी उनका ध्यान अच्छे से लगता है। वहीं, लाठी चलाना सीख रहे प्रद्युम्न सोनकर, समर्थ सराठे बताते हैं कि लाठी चलाना बहुपयोगी खेल है। इससे न केवल शारीरिक क्षमता बढ़ती है, बल्कि आत्मरक्षा व दूसरों की मदद भी की जा सकती है। इन सभी का कहना है कि आधुनिक खेलों की तुलना में कम संसाधनों के साथ खेले जाने वाले ये परम्परागत खेल पूर्वजों की विरासत हैं। इनसे जीवन के हर क्षेत्र में सहायता मिलती है।