
बस्तर का गोदना कला
Bastar tattoo art: छत्तीसगढ़ के बस्तर में गोदना आदिवासी एवं ग्रामीण संस्कृति का अंग है। बस्तर के ग्रामीण अंचल में गोदना अधिक देखने को मिलता है। वैसे हिन्दू धर्म में लगभग सभी जातियों में गोदना प्रथा आदिकाल से प्रचलित है। विश्व भर में इसे आदिवासी संस्कृति का अंग माना जाता है।
गोदना शब्द का शाब्दिक अर्थ चुभाना है, या फिर सतह को बार-बार छेदना। शरीर में सुई चुभोकर उसमें काले या नीले रंग का लेप लगाकर गोदना कलाकृति बनाई जाती है जिसे गोदना और इसे अंग्रेजी में टैटू कहा जाता है इस कला को गोदना कला भी कहा जाता है।
गोदने की प्रथा पूरे छत्तीसगढ़ में व्यापक रूप से प्रचलित है। यह शरीर कला का एक रूप है जो ज्यादातर महिलाओं द्वारा महिलाओं पर किया जाता है, मुख्य रूप से इस क्षेत्र के आदिवासी और 'निम्न' जाति समुदायों के बीच। इस अभ्यास के लिए प्रयुक्त शब्द गोदना है, जिसका अर्थ सुई से शरीर को छेदना है।
गोदना या टैटू मध्य भारत में छत्तीसगढ़ की गोंड जनजाति द्वारा प्रचलित एक प्राचीन कला है। गोदना के कई रूप हैं, जिनमें से प्रत्येक का एक विशिष्ट महत्व है- कुछ प्रकृति में उपचारात्मक हैं, जबकि अन्य एक महिला के जीवन में पारित होने के संस्कारों के अनुसार लागू होते हैं - जैसे कि यौवन, विवाह और प्रसव। उपचार की उनकी शक्तियों और उनके कर्मकांडों के महत्व के लिए टैटू को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।
यह जनजातीय टैटू का एक रूप है जो हाथ से शरीर पर किया जाता है। चूँकि आधुनिक समय में यह कला रूप युवतियों द्वारा अपने शरीर पर किए जाने के लिए पसंद नहीं किया जाता है, इसलिए वे विभिन्न माध्यमों की ओर बढ़ रही हैं।
महिलाओं में गोदने का रिवाज
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में जनजातियों और कुछ अन्य जातियों की महिलाओं में गोदने का रिवाज पारंपरिक रूप से चला आ रहा हैं। बस्तर के वन में निवास करने वाले गोंड, अबुझमाड़िया, दंडामी माड़िया, मुरिया, राऊत, मरार, पनका, कलार, हल्बा, भतरा, गडवा, दोरल्ली आदि अपने बस्तरिया रीति रिवाज के लिए बहुर्चित हैं। क्षेत्र नारियां आज भी बड़ी ललक के साथ गोदना गुदवाती हैं।
पुरुषों की अपेक्षा महिलांए ज्यादा कराती हैं गोदना
गोदना का संबंध आदिवासी महिलाओं में जन्मजात सौंदर्य भावना से जुड़ा हुआ हैं। आदिवासी लोक जीवन में यह उसी प्रकार व्याप्त हैं, जिस तरह से जल में शीतल, आग में उष्णता और दुध में नवनीत समाहित होती है। सौंदर्य के प्रति जागरूक नारियों में ही विशेष तौर पर गोदना के प्रति लगाव अधिक होता हैं।
यही वजह है कि बस्तर में आदिवासी पुरुषों की अपेक्षा महिलांए ज्यादा अपने शरीर पर गोदना गुदवाती हैं। अपने को अधिक सुंदर बनाकर अपने प्रेमी को रिझाने के उद्देश्य से माथे, ठुड्डी, गालो, नाक, गले, हाथ, पाव, तलवे, एड़ी आदि में नवयुवती अच्छी से अच्छी आकृर्तियों के गोदने गुदवाती हैं और अधिक सुंदर व श्रेष्ठ लगती हैं।
गोदना कला का चिकित्सकीय उपयोग
गोदने का चिकित्सकीय उपयोग भी किया जाता है ऐसा माना जाता है की बच्चों के अपंग होने पर उनके हाथ-पैर पर किसी विशेष स्थान पर गोदना कराए जाने पर वह अंग क्रियाशील हो जाता है।
महिलाओं के बच्चे न होने की स्थिति में नाभि के नीचे गोदना गोदा कर उनकी कोख खुलवाई जाती है, इस प्रकार कई क्षेत्रों में ग्रामीण द्वारा कई मान्यताएं प्रचलन में हैं, इस सब के अतिरिक्त कई लोग अपने मित्र का, अपने इष्ट देवी देवता का नाम से भी गुदवाते हैं।
जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे कलाकार
आधुनिक समय में, कम लोग गोदना गुदवाते हैं, क्योंकि वे नौकरियों के लिए शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं जहाँ टैटू बनवाए जाते हैं। तेजी से बदलती इस दुनिया में गोदना कलाकार जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह परियोजना तब शिल्पियों और जनजातीय कलाकारों के लिए नए तरीकों से सोचने के तरीके के रूप में है - एक ऐसी दुनिया में जहां वे अब केवल पारंपरिक नेटवर्क और प्रणालियों के माध्यम से खुद को बनाए रखने में सक्षम नहीं हैं।
Published on:
10 Dec 2022 05:33 pm

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