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छह सौ साल पुरानी इस महापर्व की हुई शुरूआत, जानिए इस पर्व की खास बातें

आसना से भगवान शालीग्राम को लाकर जगन्नाथ मंदिर में विराजमान किया गया। प्रतिमा का अभिषेक किया गया उसके बाद चंदनजात्रा का विधान पूरा हुआ।    

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छह सौ साल पुरानी इस महापर्व

छह सौ साल पुरानी इस महापर्व की हुई शुरूआत, जानिए इस पर्व की खास बातें

जगदलपुर. आसना से भगवान शालीग्राम को लाकर गुरूवार को जगन्नाथ मंदिर में विराजमान किया गया। प्रतिमा का अभिषेक किया गया उसके बाद चंदनजात्रा का विधान पूरा हुआ। चंदनजात्रा विधान के साथ ही छह सौ साल पुराने गोंचा पर्व की शुरूआत हुई।

शालीग्राम का दूध, दही, घी, शहद, पंचामृत, औरं इंद्रावती के जल से अभिषेक हुआ
इस मौके पर समाज के पदेन पाढ़ी के मार्गदर्शन में भगवान जगन्नाथ स्वामी वं भगवान शालीग्राम का दूध, दही, घी, शहद, पंचामृत, औरं इंद्रावती के जल से अभिषेक हुआ। इस दौरान वैदिक मंत्रोचार जारी रहा। 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के पूर्व अध्यक्ष दिनेश पाणिग्रही ने बताया कि बस्तर गोंचा का प्रथम विधान चंदन जात्रा जयेष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।

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पर्व की महत्ता व क्रियाकलाप अनवरत जारी
गोंचा महापर्व की शुरुआत 1408 से हुई तब से यह अनवरत जारी है। प्रथम दिवस जगन्नाथ मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित भगवान के विग्रहों को सर्वप्रथम नीचे उतारा जाता है। यहां पूजा विधान के बाद प्रसाद का वितरण होता है। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा व बलभद्र के 22 विग्रहों को मंदिर में स्थित मुक्ति मंडप में स्थापित किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आज से भगवान जगन्नाथ का अनसर काल प्रारम्भ हो जाता है, यह अवधि 15 दिवस की होगी इस दौरान भगवान जगन्नाथ के दर्शन वर्जित रहेगा।

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नेत्रोत्सव के बाद दर्शन देंगे भगवान
जुलाई माह के दूसरे सप्ताह नेत्रोत्सव अनुष्ठान के बाद भगवान जगन्नाथ सर्वजन को दर्शन देगे। 14 जुलाई को श्रीगोंचा रथयात्रा होगी। 15 जुलाई को सामूहिक उपनयन-विवाह। 17 जुलाई को अखंड रामायण पाठ। 19 जुलाई को छप्पन भोग। 22 जुलाई को बहुड़ा गोंचा रथयात्रा। 23 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ बस्तर गोंचा पर्व का समापन होगा।