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Cock Fighting: यूं तो बस्तर अपने आप में एक जीवन शैली है लेकिन जब आप बस्तर के हाट बाजार में जाएंगे, उसे देखेंगे तो आपको बस्तर जीवन शैली की विविधता दिखाई देगी। बस्तर संभाग के हर दस किलोमीटर में आपको अलग-अलग तरह की जीवन शैली दिखाई देगी। यहाँ के हाट बाजार में आसपास के कई गांव के लोग शामिल होते हैं। सप्ताह भर का राशन खरीदते हैं। बस्तर के हाट-बाजार में लोगों के मनोरंजन के लिए मुर्गा-लड़ाई और महुआ शराब भी उपलब्ध होता है।
बस्तर में मुर्गा लड़ाई लोगों के मनोरंजन का एक साधन है। पिछले कई सालों से बस्तर के आदिवासी मुर्गा लड़ाई में रूचि दिखाते हैं और अपना मुर्गा दांव पर लगाते रहे हैं। अब समय के साथ-साथ गावों के अलावा शहर के लोग भी ग्रामीण अंचलों में लगने वाले हाट बाजारों में मुर्गा लड़ाई देखने और मुर्गे पर दांव लगाने के लिए पहुंचते हैं। चूंकि, मुर्गा लड़ाई बस्तर का पारंपरिक मनोरंजन का साधन है इस वजह से इस पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं होता।
परिवार से कहीं ज्यादा मुर्गे का ख्याल रखता है मालिक
छत्तीसगढ़ के बस्तरवासी मुर्गा-लड़ाई पर लाखों रुपए का दांव लगाते हैं। इसकी सबसे खास बात यह होती है कि मुर्गा लड़ाई का कोई खास दिन निर्धारित नहीं होता है। मुर्गा लड़ाई हाट बाजारों के आकर्षण का केंद्र होती है। दांव पर लगाए जाने वाला मुर्गा सामान्य मुर्गा नहीं होता। इस मुर्गे को मालिक बड़े प्यार और जतन से पाल पोसकर बड़ा करता है। मुर्गा लड़ाई के शौकीनों की प्रतिष्ठा मुर्गे से जुड़ी होती है इसलिए परिवार से कहीं ज्यादा मुर्गे का ख्याल रखा जाता है।
मालिक मुर्गे की तेजी और वार करने की क्षमता बढ़ाने के लिए सामान्य दाना पानी समेत जड़ी बूटियां भी खिलाते हैं। जहा मुर्गा लड़ाई होती है वहां पर फेंसिंग से घेरा बनाया जाता है। मुर्गे के पैरों में लड़ाई शुरू होने से पहले छुरी बांधी जाती है। इसी छुरी से मुर्गा प्रतिद्वंदी मुर्गा पर वार करता है और मुर्गे की मौत होने के साथ ही खेल खत्म हो जाता है। इस खेल की खासियत यह है कि मुर्गा लड़ाई में लोगों के 100 रुपये से लेकर 50 हजार और 2 से 3 लाख रुपये तक दांव पर लगाए जाते है।
मुर्गे के खान पान की रूटीन
मुर्गा लड़ाई के शौकीन बस्तर के ग्रामीण अंचलों में हर घर एक न एक मुर्गा पाला ही जाता है। मालिक मुर्गे को बड़े ही प्यार और जतन से पालते हैं। उन घरों में बकायदा मुर्गे के खान पान की रूटीन होती है। समय-समय पर मुर्गे को छोटे बच्चे की तरह खिला-पिलाकर एकदम तंदुरुस्त रखा जाता है ताकि मुर्गा लड़ाई के दौरान स्फूर्ति और वार करने की क्षमता हमेशा बनी रहे।
कांकेर जिले के नरहरपुर में रहने वाले विष्णुराम मरकाम ने बताया कि मुर्गा लड़ाई आदिवासियों के मनोरंजन का एक साधन है। इस खेल में सभी रूचि लेते हैं। मालिक अपने मुर्गे को लड़ाने के लिए दांव में लगाता है। दुसरे ग्रामीण और शहर से आने वाले लोग भी मुर्गे पर दांव लगाते हैं। मुर्गा की लड़ाई में विजेता मालिक के साथ ही खिलाने वाले को भी मुनाफा होता है।
Published on:
25 Nov 2022 06:02 pm
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