
बस्तर दशहरा की मुरिया दरबार परंपरा पर आचार संहिता का खलल
जगदलपुर। Chhattisgarh News: बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्म मुरिया दरबार का आयोजन 26 अक्टूबर को होना है। इधर चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित कर दी हैं। चुनाव की तिथि के साथ ही बस्तर संभाग में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। इसी आदर्श आचार संहिता के दायरे में बस्तर दशहरा की एक प्रमुख रस्म मुरिया दरबार भी आ गया है। लोक रीति के अनुसार मुरिया दरबार का आयोजन तो होना ही है, पर इस दरबार में होने वाली लोक लुभावन घोषणा पर आचार संहिता की लगाम कसी रहेगी।
बस्तर में रियासतकाल से दशहरा पर्व मनाया जाता रहा है। आम तौर पर 75 दिनों तक मनाया जाने वाला बस्तर दशहरा इस वर्ष तिथियों व मत मतांतर की वजह से 107 दिनों तक चलेगा। आने वाले दिनों में इसके महत्वपूर्ण विधान पूरे होने हैं। इन धार्मिक विधानों में राजैनतिक विधानसभा चुनाव की तिथियों ने ग्रहण लगा दिया है।
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सवा छह सौ साल से बस्तर राजपरिवार दशहरा के पूरे विधि विधान में प्रमुख भूमिका में रहता था। एक तरह से बस्तर के राजा इस पर्व की धूरी थे। कालांतर में लोकशाही की इस परंपरा का लोकतंत्र में विलय हो गया। इसके बाद से मतदाताओं के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि दशहरा कमेटी में शामिल होते चले गए। कुछ दशक से सांसद इस दशहरा कमेटी के पदेन अध्यक्ष बनते रहे हैं। सांसद की आमद की वजह से इस दशहरा में सियासत व प्रशासनिक दखलंदाजी होने लगी। हालांकि वर्तमान में भी बस्तर की सामाजिक सहकारिता व लोक आस्था से जुड़े दशहरा में राजपरिवार के प्रति अगाध श्रद्धा देखी जा सकती है। दशहरा की विविध परंपरा में ग्रामीण स्तर के पुजारी, मुखिया, मांझी, परगना, मेंबर- मेंबरिन ही सक्रिय रहते हैं। शासन- प्रशासन की भूमिका व्यवस्था संभालने तक सीमित रहती है। आचार संहिता की वजह से अब प्रशासन इन प्रतिनिधियों को पीछे धकेल प्रमुख भूमिका में आ गया है।
ऐसा सजता है मुरिया दरबार
दशहरा पर बस्तर संभाग के सभी जिले, ब्लाक, नगर व ग्राम के लोग शामिल होते हैं। इनके प्रतिनिधि मांझी- मुखिया, मेंबर- मेंबरिन की समस्याओं को सुनने व उन्हें राहत दिलाने राजा मुरिया दरबार का आयोजन करते थे। लोकतंत्र के आने के बाद से अब सिरहासार भवन में मुरिया दरबार सजता है। यहां एक मंच पर मुख्यमंत्री- सांसद- विधायक व राजपरिवार के सदस्य बैठकर इन समस्याओं को सुनते थे। व इनके हित के निर्णय सुनाते हुए कई लोक लुभावन घोषणाएं करते थे। इस मर्तबे ऐसा नहीं होगा। इस साल सांसद दीपक बैज दशहरा कमेटी के पदेन अध्यक्ष हैं। इसके साथ ही वे कांग्रेस के पीसीसी अध्यक्ष हैं। स्वाभाविक है कि मुरिया दरबार में उनकी मौजूदगी रस्म अदायगी ही होगी।
2018, 2013 में भी आई थी ऐसी नौबत
बस्तर दशहरा की तिथियां अक्टूबर व नवंबर माह में पड़ती हैं। इसलिए इससे पहले भी छत्तीगढ़ राज्य गठन के बाद 2018 और 2013 के विधानसभा चुनाव में भी ऐसी स्थितियाँ बनी थीं। उस दौरान भी इस रियासतकालीन परंपरा पर सियासत का ग्रहण लगा था।
आचार संहिता में होने वाली दशहरा की प्रमुख रस्म
10 अक्टूबर- मंगरमूही का विधान
14 अक्टूबर- काछनगादी नेंग
15 अक्टूबर- कलश स्थापना, जोगी बिठाई
16 अक्टूबर- नवरात्र पूजा आरंभ्
17 अक्टूबर- फूलरथ की परंपरा
18, 19, 20, 21 अक्टूबर तक रथ परिक्रमा
22 अक्टूबर - महाष्टमी व निशाजात्रा
23 अक्टूबर- मावली परघाव
24 अक्टूबर- भीतर रैनी
25 अक्टूबर-बाहर रैनी
26 अक्टूबर- मुरिया दरबार व काछन जात्रा
31 अक्टूबर- माता दंतश्वरी की विदाई बस्तर का चुनावी शेड्यूल
13 अक्टूबर- नामांकन
20 अक्टूबर- नामांकन की अंतिम तिथि
21 अक्टूबर- नाम वापसी प्रक्रिया
23 अक्टूबर- नाम वापसी पर मुहर
5 नवंबर- प्रचार अभियान
7 नवंबर- मतदान
3 दिसंबर- मतगणना- परिणाम व आचार संहिता समाप्त
Published on:
11 Oct 2023 01:36 pm
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