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Rajasthan Plantation Scam: सीसीएफ का ‘लेटर बम’… 17 करोड़ के घोटाले में मुख्यालय ही बना भ्रष्टाचारियों की ढाल

Rajgarh Plantation Scam: राजस्थान के वन विभाग में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई को लेकर एक गंभीर प्रशासनिक गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है। इस प्रशासनिक खींचतान का केंद्र अलवर का 17 करोड़ रुपए का बहुचर्चित राजगढ़ पौधारोपण घोटाला है।

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जयपुर

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Anil Prajapat

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विकास सिंह

Mar 23, 2026

Rajgarh Plantation Scam

यह सुरीवाला की 11 में से एक वृक्षारोपण साइट है, जहां मजदूरों की जगह मशीनों से खुदाई की गई थी। जबकि पैसा मजदूरों के नाम से निकाला गया था। फोटो स्रोत: जांच रिपोर्ट में सबमिट सरकारी दस्तावेज

जयपुर। राजस्थान के वन विभाग में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई को लेकर एक गंभीर प्रशासनिक गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है। एक तरफ जांच अधिकारी करोड़ों की चपत लगाने वाले फील्ड अफसरों पर कार्रवाई चाहते है, तो दूसरी तरफ विभाग का शीर्ष नेतृत्व उन्हें अभयदान देने में जुटा है। इस प्रशासनिक खींचतान का केंद्र अलवर का 17 करोड़ रुपए का बहुचर्चित राजगढ़ पौधारोपण घोटाला है।

हालात ऐसे है कि कथित घोटाले के आरोपी अफसर अपने पदों पर जमे हैं, जबकि दोषियों को सजा दिलाने की वकालत करने वाले अफसर को ही अचानक जांच से बेदखल कर दिया गया है। चौंकाने वाला पहलू यह है कि घोटाले की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और भ्रष्टाचार का यह पूरा मामला वन मंत्री संजय शर्मा (अलवर के ही विधायक) की व्यक्तिगत जानकारी में है।

विभाग में 'खेल' का खुलासा मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) राजीव चतुर्वेदी के 12 मार्च 2026 के एक 'लेटरबम' से हुआ, जिसमें उन्होंने विभाग के मुखिया यानी कार्यवाहक प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) पवन कुमार उपाध्याय पर सीधे और बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं।
इस लेटर-बम के बाद मुख्यालय ने दागी अफसरों पर कार्रवाई करने के बजाय महज चार दिन बाद (16 मार्च 2026) घोटाले की तह तक पहुंच चुके जांच अधिकारी राजीव चतुर्वेदी को ही बेदखल कर जूनियर अधिकारी को जांच सौप दी। कारण बताया गया कि 21 नवंबर 2025 को चतुर्वेदी का तबादला हो चुका है।

सवाल उठ रहा है कि चार माह पहले हो चुके तबादले की याद तब क्यों आई जब चीफ पर कवर-अप के सीधे आरोप लगे? दूसरा सवाल यह कि जब बड़ा अधिकारी जांच कर चुका हो तो छोटा अधिकारी उसकी समीक्षा कैसे कर सकता है? वैसे भी चतुर्वेदी को व्यक्तिशः जांच दी गई थी। ऐसे मामलों में तबादले के बाद भी जांच का जिम्मा बरकरार रखा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना

ललिता कुमारी केस (2014): संज्ञेय अपराध पर तत्काल एफआइआर अनिवार्य है।
उल्लंघनः 17 करोड़ रुपए के गबन की पुष्टि के बाद भी एफआइआर के बजाय फिर विभागीय जांच का सहारा।

विनीत नारायण (1997) एवं सुब्रमण्यम केस (2013): जांच अधिकारियों का मनमाना तबादला प्रतिबंधित है।
उल्लंघनः राजीव चतुर्वेदी को रातों-रात हटाना जांच अधिकारियों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण के विरुद्ध।

सुब्रमण्यम स्वामी केस (2012): भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन स्वीकृति 3-4 माह में देना अनिवार्य।
उल्लंघनः फाइल को छह महीने तक दबाए रखना सीधे तौर पर कोर्ट की अवमानना।

सीसीएफ के आरोप

1. एफआइआर में जानबूझकर देरीः 17 करोड़ रुपए के गबन की पुष्टि के बावजूद मुख्यालय ने छह माह तक केस का प्रस्ताव दबाए रखा।
2. नियम विरुद्ध नई जांचः मामले को भटकाने के लिए जांच मूल अधिकारी से छीनकर नियमों के खिलाफ जूनियर अधिकारी को सौंप दी गई।
3. दोषियों को संरक्षणः दो आइएफएस अधिकारियों को नोटिस देने के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं हुई। साथ ही, अरण्य भवन (मुख्यालय) में 20 एयरकंडीशनर घोटाले पर भी मुख्यालय मौन है।
4. एसीबी जांच से इनकारः प्रारंभिक जांच में घोटाला साबित होने और एसीबी जांच की सिफारिश के बावजूद मुख्यालय ने चुप्पी साध ली और बिना कारण दोबारा जांच बिठा दी।

    जवाब मंत्री जी ही देंगे

    मैं इस मामले में बयान नहीं दूंगा। इस पर जवाब एसीएस और मंत्री जी ही देंगे।
    -पवन कुमार उपाध्याय, पीसीसीएफ (हॉफ) और वन रक्षा प्रमुख

    सिर्फ मेरा नाम न लें

    मामले की जांच में सिर्फ मेरा नाम लेना सही नहीं है। उस दौरान कुल आठ डीएफओ कार्यरत रहे थे।
    -अपूर्ण कृष्ण श्रीवास्तव, आइएफएस, तत्कालीन डीएफओ, अलवर (वर्तमान डीएफओ कोटा)

    मैं कुछ नहीं बोलूंगा

    'मामले में जांच चल रही है। मैं इस पर कुछ नहीं बोलूंगा। (यह कहते हुए फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।
    -राजेंद्र कुमार हुड्डा, तत्कालीन रेंज अफसर एवं वर्तमान डीएफओ अलवर (आरोपी अधिकारी)