
जयपुर। 11 मई भारत के लिए गर्व का दिन है। इस दिन भारत ने पोखरण-द्वितीय परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया था। भारतीय सेना द्वारा किया गया यह परीक्षण देश के लिए कई मायनों में खास था। इसका नाम था 'ऑपरेशन शक्ति'। इस ऑपरेशन के जरिए भारतीय सेना ने एक साथ पांच परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक किए। इसके बाद भारत को परमाणु सम्पन्न देश घोषित कर दिया गया।
11 मई 1998 वह दिन है जब भारत ने तीन परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था। दो दिन बाद दो और परमाणु परीक्षण किए गए। तीन दिन में पांच परीक्षण हुए, जो सफल रहे। इस सफलता के बाद वैज्ञानिकों और देश में जश्न का माहौल है। सफल परीक्षण के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र घोषित किया था।
इस परीक्षण के बाद भारत ऐसा करने वाला दुनिया का छठा देश बन गया। जबकि भारत पहला परमाणु शक्ति संपन्न देश था जिसने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किया था। अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, फ्रांस और चीन के बीच एक अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ था, जिसे एनपीटी कहा जाता है। इसका लक्ष्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और परमाणु हथियारों के खात्मे की दिशा में कदम उठाना है। यह कदम उठाते ही भारत पूरी दुनिया में सहम गया और परीक्षण के अगले साल 11 मई से भारत सरकार ने 'रिसर्जेंट इंडिया डे' मनाने का फैसला किया।
पोखरण से जुड़ी कई अनसुनी कहानियां हैं। लेखक राज चेंगप्पा ने इस विषय पर 'वेपंस ऑफ पीस' नामक पुस्तक लिखी थी। किताब में ऐसी कई कहानियां हैं जो भारतीयों की मेधा और वीरता की गवाही देती हैं। आइए इनमें से एक खास किस्सा आपके साथ साझा करते हैं।
पोखरण विस्फोटों को गुप्त रखना सभी के लिए आश्चर्य की बात थी। यहां तक कि सीआईए यानी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी को भी इसकी भनक नहीं लगी। इस परीक्षण से पहले दुनिया मानती थी कि सीआईए की पैनी निगाहें हमेशा पोखरण पर अपने सेटेलाइट के जरिए टिकी रहती हैं। लेकिन इस मामले में परमाणु परीक्षण करने वाली टीम ने जो चतुराई दिखाई और सीआईए को मूर्ख बनाया, उसे भी परमाणु विस्फोट जितना ही अहम माना जा रहा है।
उस दिन क्या हुआ था
राजस्थान के सीमावर्ती जिले जैसलमेर के पोखरण में सुबह बेहद शांत रही। हवा बह रही थी। तभी कुछ निर्देश दिए गए और ट्रक, बुलडोजर खोदे गए कुओं की ओर बढ़ने लगे। कुछ ही देर में मशीनों की तेज आवाज सुनाई दी। थोड़े ही समय में कुएँ में न केवल रेत भर दी गई, बल्कि उसके ऊपर बालू के छोटे-छोटे पहाड़ भी बना दिए गए। उनमें से मोटे तार निकले। कुछ ही देर में इनमें आग लग गई और इसके बाद जोरदार धमाका हुआ। विस्फोट से भूरे रंग का मशरूम के आकार का बादल उत्पन्न हुआ। करीब 20 लोग बड़ी उम्मीद से इसे देख रहे थे। इतने में इनमें से एक वैज्ञानिक ने जोर से कहा 'Catch us if you can', यानी 'पकड़ लो अगर हमें पकड़ सको'.... इसके बाद वहां हंसी की आवाज गूंजने लगी। उनका मिशन पूरा हो गया था।
भारत के इस सीक्रेट मिशन को अमेरिकी एजेंसी सीआईए की सबसे बड़ी खुफिया विफलता माना जा रहा है। धमाके के बाद अमेरिका ने अपने सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों को डाउनलोड किया। उनके वैज्ञानिकों में इस बात की चर्चा थी कि भारतीयों ने इस परमाणु परीक्षण को इतने गोपनीय तरीके से कैसे अंजाम दिया?
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दरअसल, भारतीय सेना की 58 इंजीनियर रेजीमेंट को इस काम के लिए खासतौर पर चुना गया था। कर्नल गोपाल कौशिक इस रेजीमेंट के कमांडेंट थे। उनकी सुरक्षा में भारत के परमाणु हथियारों का परीक्षण किया जाना था। साथ ही इस मिशन को गुप्त रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी उन्हीं पर थी। जिसे उन्होंने और उनकी रेजिमेंट ने इतना अच्छा प्रदर्शन किया कि भारत ने मई 1998 में पांच परमाणु हथियारों का परीक्षण किया, इसे CIA की सबसे बड़ी खुफिया विफलताओं में से एक माना जाता है।
Published on:
11 May 2023 02:51 pm
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