
वाजपेयी जी नहीं रहे। जाना तो था। राजनीति में शुचिता की मशाल थे, बुझ गई। अब नहीं लौटेंगे वे दिन। अब कोई कवि हृदय नहीं आएगा राजनीति में, जो क्रान्तदर्शी भी हो और संवेदनशील भी। स्पष्टवादी भी हो, कभी पद से बंधकर जीया नहीं हो, सदा साधारण व्यक्ति बनकर रहा हो। आज देखो, हर नेता को सुरक्षा चाहिए। सुविधा चाहिए। देश के लिए, देशवासियों के लिए कौन अब चिंतित होगा।
हां, भाजपा नेताओं के बड़बोलेपन से वे प्रसन्न नहीं थे। एक से अधिक बार कहा होगा कि ‘यह हमारा दुर्भाग्य है।’ बड़े लोग समय से पहले पैदा होते हैं, चले जाते हैं और जब समय आता है तब बहुत याद आते हैं। वे ऐसे कूटनीतिज्ञ थे, जिनकी बात का हर पक्ष विश्वास भी करता था और लोहा भी मानता था। वे लोकतंत्र के कुरुक्षेत्र को खाली कर गए। वाजपेयी जी राजनीति की एक ऐसी गीता लिख गए, जिसको पढ़ने वाला अर्जुन राजनीति में कब जन्म लेगा, समय तय करेगा।