
'अध्यात्म ज्योति' पुस्तक में लेखक प्रताप सिंह ने आध्यामित्कता के साथ सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति के महात्म्य के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला है। पुस्तक में ग्यारह अध्यायों में सुविन्यस्त, सुविवेचित कथा और शिल्प की दृष्टि में सर्वात्मना पठनीय रोचक पुस्तक है। अध्यात्म की दृष्टि से इस पुस्तक में भगवत गीता, रामयण, रामचरित मानस व राम , शिव , सीता के सम्बन्ध में गहनता से विचार किया गया है। अध्यात्म ज्योति में 14 निबंधात्मक लेख हैं। इसमें भगवान राम पर तीन , सीता पर तीन , गोस्वामी तुलसीदास पर एक और रामायण पर एक लेख लिखा गया है। अध्यात्म का अर्थ समझने व जीवन में उतारने के लिए यह पुस्तक पढ़ें। किस तरह से अध्यात्म धर्म, कर्म, योग, साधना से जुड़ा हुआ है। हमें यह समझने की जरूरत है कि अध्यात्म का हमारे जीवन में कितनी अहम भूमिका निभाता है। हमारे पूर्वजों और ऋषि मुनियों व वेद पुराणों, उपनिषद ने यह हमारे एक अनमोल विरासत छोड़ी है, जिसके बिना एक सफलतापूर्वक और सुखद जीवन जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
पुस्तक में लेखक ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि — ' अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और राष्ट्रभक्ति भावना सर्वोपरि हो एवं राष्ट्र सम्मान को स्वयं के अध्यात्म रूपी स्वाध्याय में सम्मिलित करें।' मनुष्य को चाहिए कि वह अपने दैनिक जीवन को विवेकपूर्ण बनाये।
'' मनुष्य के मानवता में ढलने हेतु वर्तमान समय में धैर्य और धर्माचरण की आवश्यकता है। जीवन की सफलता के लिए जिन्दगी का आदर्श होना नितांत अनिवार्य है। हमें भगवान पर भरोसे के साथ ही आत्मविश्वास की भी जरूरत है। आगे लेखक कहते है कि हम अच्छाई के मार्ग पर चलें, दूसरों से कुछ न मांगने की उम्मीद रखें और अपने विश्वास पर अड़िग रहें।''
अब देश व समाज का भविष्य युवाओं के हाथ में है और युवा ही राष्ट्र की सच्ची और वास्तविक पूंजी है, सम्पत्ति हैं। लेकिन युवा जिस दिशा में आगेे बढ़ रहा है उससे उनका पतन ज्यादा दूर नहीं है। आज का युवा नशें की गिरफ्त में है और वो अध्यात्म से दूर है। अध्यात्म ऐसी विद्या है, जिससे मानव वह सब प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है जो उसे और लोक कल्याण के लिए चाहिए। अध्यात्म सत्संग का भी प्रेरणा स्रोत है तभी तो कहा जाता है, ' राम की कृपा अध्यात्म से मिलती है।'
अध्यात्म क्या है
अध्यात्म जीवन का दूसरा नाम है, अध्यात्म स्वयं को समझने और जानने की प्रक्रिया है। आत्मचिंतन, आत्मोवलोकन , आत्म रमण, शुद्धि आत्मसात कर अंत:करण की पवित्रता का नाम अध्यात्म है। अध्यात्म एक दर्शन है और चिंतन की निरंतरता है। अध्यात्म मानव समाज की अनमोल सांस्कृतिक विरासत है। जो ऋषि मुनियों एवं महा पुरूषों के चिंतन का सार है। उपनिषदों का दिव्य प्रसाद है।
अध्यात्म ईश्वर की समीपता का आभास है जब हमारा मन इधर — उधर भटकने लगता है तब अध्यात्म ही उसे एकाग्रचित कर सन्मार्ग की ओर ले जाता है और तब मनुष्य को शील , शांति, की प्राप्ति होती है। लेकिन धर्म और अध्यात्म का अर्थ अलग है। अध्यात्म तो आन्तिरिक ज्ञान से होता है और धर्म का संबंध बाहरी जगत से होता है। मनुष्य जब अध्यात्म को अपना लेता है तो वह अध्यात्मिक हो जाता है।
भक्ति का अध्यात्म से जुड़ाव
भक्ति एक भावना है जो भगवान, व्यक्ति और विचारधारा से जुड़ी है— जिसमें मन समर्पण भाव से डूब जाता है और तब मन सम्पूर्णता से भगवान में लग जाए तो हम मन का अध्यात्म से जुड़ाव मान लेते हैं अन्यथा वह सांसारिक चीजों में घूमता रहता है। आत्मा को जानने के लिए आत्म चिंतन की जरूरत है व स्व आत्मा को जानने के लिए एकाग्रचित होना इसके लिए भक्ति का भाव होना आवश्यक है।
धर्म और अध्यात्म
धर्म एक व्यवहार है, सौदा, डीड है और अध्यात्म एक अन्तहीन यात्रा है। धार्मिक भाव की जड़ धर्म होती है।
यही बात धर्म और अध्यात्म के संबंध में उभरती प्रतीत होती है कि धर्म पहले या अध्यात्म ? विषय अत्यंत ही गूढ़ है। इतना तो कहा ही जा सकता है कि धर्म का संबंध आध्यात्मिकता प्रौढ़ता से है। मनुष्य जब धर्म की ओर गया, तो धर्म आया तब अध्यात्म आया और जब मनुष्य अध्यात्म आया तो धर्म आया । अत: अलग—अलग हाते हुए भी एक दूसरे से संबंधित अवश्य हैं। सुख और दिव्य प्रकाश की प्राप्ति धमें से शुरू होकर अध्यात्म पर समाप्त होती है। आध्यात्मिक जीवन में आदर्श एक महत्वपूर्ण तत्व है।
Published on:
08 Apr 2023 06:21 pm
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