
Ajmer Sharif Dargah - 10 Amazing Facts about Ajmer's Dargah Sharif
जयपुर/अजमेर। राजस्थान का अजमेर जिला... जहां स्थित है भारत के पवित्र स्थानों में से एक अजमेर शरीफ... इसकी खासियत है कि यहां मुस्लिमों के अलावा भी हर धर्म के लोग मन्नत मांगने पहुंचते हैं। अजमेर शरीफ दरगाह हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की मजार है। आपको बताते चलें कि यहां आम लोगों से लेकर बॉलीवुड, राजनीति और इंडस्ट्री से भी दिग्ग्ज पहुंचते हैं।
यह दरगाह अजमेर शहर के ठीक बीच में है। ख्वाजा मौइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में जाने के लिए चारों तरफ दरवाजे हैं। सबसे भव्य और आकर्षक दरवाजा निजाम गेट है, जो मुख्य बाजार की ओर खुलता है।
तीन साल में शुरू बन कर तैयार हुआ निजाम गेट
निजाम गेट तीन साल में बन कर तैरूार हुआ। इसका निर्माण 1912 ई. में शुरू हुआ था, जिसे जनाब मीर उस्मान अली खां साबिक नवाब हैदराबाद ने बनवाया था। इसकी ऊंचाई करीब सत्तर फीट, चौड़ाई मय बरामदों के 24 फीट है। मेहराब की चौड़ाई सोलह फीट है। दरवाजे के ऊपर नक्कार खाना है।
शाहजहां ने भी बनवाया दरवाजा
दरगाह शरीफ में प्रवेश करने के लिए उस्मानी दरवाजे तक पहुंचना होता है। इससे निकलने के बाद एक पुराना दरवाजा आता है। इस दरवाजे के ऊपर शाही जमाने का नक्कारखाना है। कहा जाता है कि इस दरवाजे को शाहजहां ने 1047 हिजरी में बनवाया था। इसलिए इस दरवाजे को नक्कारखाना शाहजहानी भी कहते हैं।
साल में चार बार खुलता है जन्नती दरवाजा
अजमेर दरगाह के पश्चिम में चांदी चढ़ाया हुआ एक बहुत खूबसूरत दरवाजा है। इसे जन्नती दरवाजा कहते हैं। यह दरवाजा साल में केवल चार बार खुलता है। एक बार वार्षिक उर्स के समय, दो बार ईद पर, और चौथी बार ख्वाजा साहब की पीर के उर्स पर। अजमेर दरगाह शरीफ शाह जहानी मस्जिद मुगल आर्किटेक्चर का बेहद नायाम नमूना है। यहां अल्लाह के 99 पवित्र नामों के 33 खूबसूरत छंद लिखे हुए हैं।
महमूद खिलजी की याद में बनवाया गया बुलंद दरवाजा
कालिम दरवाजे से आगे चलने पर दाई तरफ शफाखाना है और अकबरी मस्जिद की सीढ़ियां हैं। इसी के सामने बुलंद दरवाजा दिखाई देता है। कहा जाता है कि अकबरी मस्जिद अकबर के जमाने की है। कहते हैं कि यहां शाहजहां सलीमा के जन्म पर अकबर बादशाह आस्ताना-ए-आलिया की जियारत करने अजमेर आए थे, तब उन्होंने इस मस्जिद के निर्माण का आदेश दिया था। फिलहाल यहां मुस्लिम धर्म के बच्चों को कुरान की शिक्षा दी जाती है। ये बुलंद दरवाजा सुलतान महमूद खिलजी की याद में बनवाया गया था। इस दरवाजे की ऊंचाई करीबन 85 फुट है। ये दरवाजा दरगाह शरीफ के सभी दरवाजों में सबसे ऊंचा है। इसलिए इसे बुलंद दरवाजा कहा जाता है। इस दरवाजे से कुछ आगे बढ़ने पर सामने एक गुम्बद की तरह सुंदर छतरी है। इसमें एक बहुत पुराने तरीके का पीतल का चिराग रखा हुआ है, जिसे सेहन का चिराग कहते हैं।
दो बड़े कढ़ाहों में बनता है प्रसाद
दरगाह के अंदर दो बड़े-बड़े कढ़ाहे रखे हैं, जिनमें निआज़ (चावल, केसर, बादाम, घी, चीनी, मेवे को मिलाकर बनाया गया खाद्य पदार्थ) पकाया जाता है। निआज़ रात में बनाया जाता है और सुबह प्रसाद के रूप में दर्शनार्थियों को दिया जाता है। छोटे कढ़ाहे में 12.7 किलो और बड़े में 31.8 किलो निआज़ बनाया जाता है। कढ़ाहे का घेराव दस फीट है। बड़ा कढ़ाहा बादशाह अकबर और छोटा बादशाह जहांगीर ने दरगाह को भेंट किया था।
शहंशाह जहांगीर ने चढ़ाया सुनहरा कटेहरा
यहां के गुम्बद के अंदर का हिस्सा पत्थर का है। फिर इसे चूने से जोड़ दिया गया। गुम्बद का बाहरी हिस्सा सफेद है, इस पर चूने का प्लास्टर है। गुम्बद के अंदरुनी हिस्से में सुनहरी व रंगीन नक्श व निगार बने हुए हैं। सफेद गुम्बद पर सोने का बहुत बड़ा ताज लगा है। ये ताज नवाब कलब अली खां (रामपुर) के भाई हैदर अली खां मरहूम ने दान किया था। मजार अक्दस का तावीर संगमरमर का है। मजार ए अक्दस को हमेशा मखमल के कब्र-पोशों से ढक कर रखा जाता है। उसके ऊपर ताजा गुलाब के फूलों की चादरें होती हैं। छप्पर-खट के बीच में सुनहरा कटेहरा लगा है, जो शहंशाह जहांगीर ने बनवाकर चढ़ाया था। दरगाह के अंदर एक स्मारक भी है, जो हजरत मुईनुद्दीन चिश्ती के समय यहां पानी का मुख्य स्त्रोत हुआ करता था। आज भी जहालरा का पानी दरगाह के पवित्र कामों में लिया जाता है।
Published on:
15 Jun 2018 12:41 pm
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