जब कभी राजधानी से दिल ऊबता है, हमारे मन में किसी गांव में जाकर बसने की हुकहुकी उठने लगती है। अचानक हमें ग्राम्य जीवन पर लिखी पुरानी कविताएं याद आने लगती हैं- आहा ग्राम्य जीवन! भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारे देश की तीन चौथाई आबादी गांवों में बसती है- जैसे जुमले दिमाग में घुसकर घंटा बजाने लगते हैं। लगता है जैसे सांझ के समय गोधूली बेला में सूर्य की अन्तिम किरणों के मध्य गौमाताओ का झुंड वापस लौट रहा है। उनके गले में घंटियां बज रही हैं।
कभी लगता है प्रात: सूर्य की गुलाबी रश्मियों के संग ग्राम्य बालाएं पनघट से पानी ला रही हैं और हम मुग्ध भाव से उनके नैसर्गिक सौन्दर्य को निहार रहे हैं। लेकिन साहब स्थितियां इनसे उलट हैं। पिछले दिनों हमारे ग्रामीण मित्र 'पीके' का फोन आया और उन्होंने दस मिनट में ग्राम्य जीवन और गायों की दशा का जो हृदयविदारक वर्णन किया कसम से हमारा जी दहल गया। लेकिन एक सरकारी खबर पढ़कर फिर गांव में जाकर बसने की तमन्ना जाग गई। खबर थी कि केन्द्र सरकार की श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन योजना में गांवों में शहरों जैसे आराम मुहैया कराए जाएंगे।
गांव की गलियों में स्ट्रीट लाइट दमकेंगी। अगर बीमार पड़ गए तो मोबाइल हैल्थ यूनिट आपके द्वार आ खड़ी होगी। घर-घर पाइप से पेयजल सप्लाई की जाएगी। सड़कों पर कचरे का नामोनिशान नहीं होगा। कसम से ऐसा सपना तो सुमित्रानंदन पंत की कविताएं भी नहीं दिखला पाई। पर क्या यह सब संभव हो पाएगा। मगर ऐसा क्यों नहीं हो पाया। पहले गांवों को सुधारने की योजनाएं जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर चलती थी अब वे अटल, दीनदयाल उपाध्याय और श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर पेश की जा रही है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि नई बोतलों में पुराना शरबत भरा जा रहा है। अब यह न कहना कि बरसों कांग्रेस का राज रहा है। कई राज्य तो ऐसे हैं जहां दसियों-बीसियों बरस तक दूसरी पार्टियों ने भी राज किया है लेकिन वहां के गांवों की स्थिति भी दूसरे गांवों से ज्यादा अलग नहीं है। अलबत्ता किसी एक गांव को वहां के निवासियों ने ही अपनी मेहनत से बदल लिया हो- यह संभव है। हमें तो लगता है कि गांवों को शहर जैसा बनाना एक झूठे सपने जैसा ही है और अगर गांव शहर जैसे बन गए तो जो समस्याएं आज शहरों में हैं वह क्या गांवों में नहीं घुसेगीं?
पता नहीं क्यों हमें बार-बार बापू याद आ रहे हैं जिन्होंने कहा था कि हरेक गांव को इतनी शक्ति हो कि वह स्वयं अपना विकास मॉडल चुन सके। बापू ने हरेक गांव को स्वावलम्बी बनाने पर जोर दिया था। और प्राचीन भारत के गांव अपने पैरों पर खुद ही खड़े थे इसीलिए वे सुखी भी थे। वहां का जीवन आनंदमयी भी था। अब तो सुविधायुक्त गांव का ख्याल एक ऐसा सपना सा लगता है जो देखने में तो बड़ा सतरंगी लगता है पर हकीकत में डराने वाली वास्तविकता लगता है। खैर हम भी आशावादियों के बाप हैं, सोचते हैं- जियेंगे तो हम भी देखेंगे फसले बहार...।
राही