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अटलजी की सभा में सांप छोडऩे की अफवाह से मच गई थी अफरातफरी

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जयपुर

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Dinesh Saini

Nov 05, 2018

atal bihari vajpayee

- जितेन्द्र सिंह शेखावत
जयपुर। आपातकाल के बाद जयपुर के त्रिपोलिया दरवाजे के सामने भाजपा के दिग्गज नेता atal bihari vajpayee की ऐतिहासिक सभा में सांप छोडऩे की अफवाह से कुछ देर तक अफरा तफरी मच गई थी। वर्ष 1977 में जनता पार्टी की यह सभा लोकसभा के प्रत्याशी सतीशचन्द्र अग्रवाल के समर्थन में हुई थी। वाजपेयी शाम को सात बजे सभा में आने वाले थे लेकिन वे रात को करीब 10 बजे पहुंचे तब तक उनको सुनने के लिए हजारों लोग त्रिपोलिया से चौड़ा रास्ता के न्यू गेट तक बैठे रहे। वाजपेयी का भाषण शुरु होने के कुछ देर बाद भीड़ में से सांप-सांप का हल्ला मचा। पांच मिनट तक अफरातफरी सी मच गई।

सतीशचन्द्र अग्रवाल ने मंच से कहा, कोई सांप नहीं है, बोखलाए हुए कांग्रेसियों की करतूत है। जयपुर के लोगों को वाजपेयी को सुनने का बहुत बड़ा चाव रहता था। चौड़ा रास्ता में बैंक के बाहर फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को जनता ने आधी रात तक सुना। इसी सभा में ही सुबह आठ बजे अटल बिहारी वाजपेयी की सभा होने की सूचना दी गई। देर रात तक सिन्हा को सुनने वाले हजारों लोग अल सुबह अटल जी को सुनने के लिए बैंक के सामने आ गए। सन् 1984 में महसाणा की सभा में वाजपेयी को पत्थर से चोट लग गई थी। चोट लगने के बाद भी वाजपेयी शाम को बड़ी चौपड़ की सभा को संबोधित करने देर रात को विमान से आए।

अमरुदों का बाग व रामनिवास बाग के अलबर्ट हाल से भी वाजपेयी ने चुनाव सभाओं को सम्बोधित किया। अलबर्ट हॉल पर हुई ऐतिहासिक सभा में बरसात की तेज बौछारों की परवाह किए बिना लोग दरियां ओढ कर वाजपेयी को सुनते रहे।अटलजी की सभाओं के गवाह रहे अशोक पांड्या के मुताबिक अटल अपने धाराप्रवाह भाषण के बीच रुकते तब श्रोता उनके आगे क्या कहेंगे, उस बात को समझ जाते थे। अयोध्या में राम मंदिर को लेकर लाल कृष्ण आडवाणी की रामरथ यात्रा जयपुर पहुंची तब त्रिपोलिया दरवाजे के बाहर जयश्रीराम के नारों के साथ हुई ऐतिहासिक सभा में हजारों लोग की भीड़ का नजारा था। एडवोकेट अखिल शुक्ला के मुताबिक उन दिनों की सभाओं व रैलियों में जनता अपने साधनों से आती थी। दरी बिछाने और तख्ते लगाने और सभा के बाद सामान को यथा स्थान पंहुचाने तक का काम कार्यकर्ता जिम्मेदारी से करते थे।

आज की हाईटेक सभाओं की तरह भीड़ के लिए वाहन आदि साधन लगाने का रिवाज ही नहीं था। मौखिक सूचना पर ही हजारों लोग नेताओं को सुनने आ जाते थे। भाजपा ही नहीं कांगे्रस में भी ऐसे ही समर्पित कार्यकर्ता थे।


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