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Video- लुप्त हो रही बहुरुपिया कला,कलाकार कर रहे कला को बचाने का प्रयास

जवाहर कला केंद्र के शिल्पग्राम में चल रहे हस्तशिल्पियों के मेले में खोण्खो करता हुआ काले मुंह का बंदर हो या फिर बच्चों के साथ बड़ों को अपनी आवाज से डराता हुआ अघोरीनाथ हो, दूधवाला हो या फिर निषादराज भीलए मेले में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

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जयपुर

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Rakhi Hajela

Oct 21, 2022

Video- लुप्त हो रही बहुरुपिया कला,कलाकार कर रहे कला को बचाने का प्रयास

Video- लुप्त हो रही बहुरुपिया कला,कलाकार कर रहे कला को बचाने का प्रयास

Rakhi Hajela
जवाहर कला केंद्र के शिल्पग्राम में चल रहे हस्तशिल्पियों के मेले में खोण्खो करता हुआ काले मुंह का बंदर हो या फिर बच्चों के साथ बड़ों को अपनी आवाज से डराता हुआ अघोरीनाथ हो, दूधवाला हो या फिर निषादराज भीलए मेले में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। दरअसल यह वह कलाकार हैं जो अपने परिवार की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए बहुरुपिया कला को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। बदले समय के चलते अब ये कलाकार और कला दोनों मुश्किल में हैं।

क्या है बहुरूपिया कला
हमारे देश की सांस्कृतिक परम्पराओं में से एक है स्वांग रचने की कला। इस कला को बहुरुपिया कला के नाम से जाना जाता है। एक ही कलाकार विभिन्न पात्रों का हूबहू स्वांग रचकर हाव भावों का मनोरंजक प्रस्तुतीकरण करता है। माना जाता है कि हिंदू राजाओं के अलावा मुग़लों ने भी इस कला को प्रश्रय प्रदान किया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग और मुस्लिम इतिहासकार अलबरूनी ने भी बहुरुपिया कलाकारों का वर्णन अपनी पुस्तकों में किया है। बौद्ध और जैन साहित्य में भी इसका उल्लेख मिलता है।
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