
जयपुर। गर्मी की आहट के साथ ही शहर के विभिन्न इलाकों में मटकों की दुकानें खुल गई है। सभी प्रमुख सड़कों और चौराहों के किनारे कलात्मक मटके बिक रहे हैं। खास बात यह है इस बार यहां जयपुर व आसपास के गांवों से ही नहीं शेखावटी, मारवाड, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली से आए मटके भी बिक रहे हैं। कलात्मकता और नई डिजाइन के चलते लोग इन मटकों को पसंद कर रहे हैं। सड़क किनारे सजी दुकानों में सामान्य मटकों के साथ ही रंगीन पच्चीकारी, फूल-पत्तियों की डिजाइन बनी हुई है। कहीं सुराईदार मटकों की बहार है तो कहीं चौड़े मुंह और गोलाइदार मटकों के साथ ही पक्षियों के लिए माटी के परिंदें बिक रहे हैं। शादी-विवाह व शुभ कार्यों में काम आनेवाली मिट्टी के रंगीन व डिजाइनदार कलश की भी काफी डिमांड है।
शहर में नहीं रहे परंपरागत मटके बनाने वाले
करीब दो दशक पहले तक शहर के बाहरी इलाकों में विभिन्न जगहों पर मटके बनाए जाते थे। कई परिवार इसमें जुटे रहते थे, वे बरसात को छोड़कर पूरे वर्ष मटके बनाते थे। अब यहां पर्याप्त चिकनी मिट्टी नहीं मिलती है। जो लोग यह काम करते थे उनकी नई पीढी का रूझान नौकरी व अन्य कार्यों की ओर बढ़ा रहा हैं। इससे उनकी संख्या बहुत कम रह गई है। अब आसपास के गांवों से मटके मंगवा रहे हैं।
60 से 300 रुपए तक उपलब्ध
मटका व्यवसायी मन्नी देवी ने बताया कि बाजार में 60 से 300 रुपए तक के मटके उपलब्ध हैं। वही क्षेत्र के अधिकतर विक्रेताओं का कहना है कि आधुनिकता के दौर में पानी ठंडा करने के लिए लोग फ्रिज का उपयोग करते हैं, लेकिन मटके के पानी का स्वाद ही कुछ ऐसा है कि उसकी चाहत लोगों को यहां खींच लाती है। गरीब से अमीर तक हर वर्ग के लोग यहां मटके खरीदनें आते हैं। लोग कहते हैं कि फ्रिज के ठंडे पानी में मटके के पानी जैसा स्वाद नहीं आता है।
जयपुर में शेखावटी और मारवाड़ और अन्य राज्यों गुजरात और हरियाणा से माल आता है। इनमें शेखावाटी ओर गुजराती मटको की मांग निरंतर बनी रहती है| 80 रू से 300 रु तक में साधारण से लेकर आकर्षक डिजाईन में मिटटी की टंकी उपलब्ध है।
हरिनारायण प्रजापत, मटका विक्रेता, अजमेर रोड
Published on:
15 Mar 2018 08:50 pm
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