साहित्यकार पद्मश्री चन्द्र प्रकाश देवल का कहना है कि जिस तरह केंचुली सांप को पीड़ा देती है,एक समय अंधा भी कर देती है उसी तरह पितृसत्तात्मक व्यवस्था नारी को उसकी पहचान से अनभिज्ञ रखती है। उस पर समाज अपना नियंत्रण चाहता है, इस केंचुली से महिलाओं का निकलना जरूरी है। जवाहर कला केंद्र की ओर से आयोजित ‘संवाद प्रवाह ‘ में नाट्य निर्देशक नीलेश दीपक और सूत्रधार राजीव आचार्य से बात करते हुए उन्होंने कहा कि विजयदान देथा बिज्जी की कहानियां नारी की स्वतंत्रता ही नहीं बल्कि स्वायतत्ता की बात करती हैं। वार्ता का आधार भारत रंग महोत्सव में नीलेश के निर्देशन में मंचित विजय दान देथा का नाटक ‘केंचुली ‘ रहा। इस दौरान जेकेके की अतिरिक्त महानिदेशक प्रियंका जोधावत व देथा के पुत्र कैलाश कबीर भी मौजूद रहे। प्रियंका जोधावत ने कहा कि संवाद प्रवाह को कला प्रेमियों का स्नेह मिल रहा है। कला का दायरा बड़ा है जिसमें कई विधाएं शामिल हैं, इस तरह की चर्चा से हर विधा को संबल मिलता है।
पात्रों की मजबूत पहचान हो स्थापित
वहीं देवल ने कहा कि लोक कहानियों के पात्रों के प्राय नाम नहीं होते हंै, निर्देशक को चाहिए कि वह नाटक में पात्रों की मजबूत पहचान स्थापित करे। उन्होंने कहानियों के अनुवाद में गंभीरता बरतने और भाषा के तकनीकी पहलुओं का ध्यान रखने की बात भी कही। नीलेश दीपक ने रंगकर्मियों की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रंगमंच में कहानियों का नाट्य रूपांतरण कर उसे नया आयाम देना संभव है साथ ही इसके मंचन में स्वतंत्रता होती है कि किस भाग को उठाया जाए। रविवार को संवाद प्रवाह के तहत सुबह 11 बजे जनशत्रु नाटक के निर्देशक संदीप भट्टाचार्य और साहित्यकार डॉ. घनश्याम नाथ कच्छावा के बीच चर्चा होगी।